Folktales लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Folktales लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 23 मार्च 2017

छैल बटाऊ-मोहना रानी

"छैल बटाऊ-मोहना रानी : नाट्य रूप में अभिमंचित मध्यकालीन प्रेमगाथा"

छैल बटाऊ-मोहना रानी की कथा मुख्यतः दो रूपों में मिलती है।
पहली, छत्तीसगढ़ी रूप में,
दूसरी, पश्चिमोत्तर भारतीय रूप में.
सबसे पहले छत्तीसगढ़ी रूप-

पुराने जमाने में अवधे नगर की राजकुमारी थी-
मोहना.
पूरा नाम मोहना दे गोरी कईना.
उसकी खूबसूरत ऐसी थी कि
जो देखे, सम्मोहित हो जाए.
राजकुमारी अपने राज्य की रानी भी बन चुकी थी।

उस समय दिल्ली में मुगल बादशाह अकबर का शासन था.
दिल्ली के पांच फकीर विचरते हुए अवधे नगर पहुँचे.
मोहना रानी ने उनका स्वागत किया,
भिक्षा में अन्न-धन-वस्त्र दिया.
फिर चलते समय पूछा कि
क्या वे उसकी अमानत बादशाह अकबर को दे देंगे।

फकीरों ने हामी भर दी.
मोहना ने उन्हें अपनी सोने की मूर्ति दी,
आदमकद, अपनी प्रतिच्छवि.
लोकभाषा में वह मूरत दपकी थी.

फकीर मूरत लेकर दिल्ली पहुंचे,
वहाँ जब वे अकबर के दरबार में गये,
तो अकबर ने जब वह मूरत देखी,
तो विस्मित रह गया कि
कोई इतना भी सुंदर हो सकता है।

उसने फकीरों से पूछा कि
क्या मोहना रानी सचमुच इतनी ही सुंदर है.
फकीरों ने कहा कि 
यह तो कुछ भी नहीं है।
सोना चाँदी में तो दूसरे रंग कहाँ आ पाते हैं,
कंचन काया तो आ जाती है, पर देह की कोमलता कहाँ आ पाती है।
सच कहें, तो आपकी पान खाई जीभ की तरह तो लाल उसके तलवे हैं.

बादशाह को सौंदर्य की प्रशंसा ने जितना मोहित किया,
अंतिम में दी गई उपमा ने उतना ही क्षुब्ध कर दिया.
उन्होंने क्रुद्ध होकर कहा-
बदतमीज फकीरों,
बादशाह की जुबान को किसी के तलवों से मिलाते हो.
चलो फिर जुबान के लिए सच में कुछ दिनों तक पैरों तले रह कर देखो.

अकबर ने फकीरों को कैद करने का हुक्म दे दिया.
पर मन में मोहना रानी की मोहिनी मूरत बस गई.
अकबर ने बीरबल से चर्चा कर राज्य में यह घोषणा कर दी कि
जो भी मोहना रानी की सूरत-मूरत ले आएगा,
उसे वह आधा राजपाट दे देंगे।
सूरत-मूरत का तात्पर्य ऐसा चित्र था,
जो निर्वस्त्र हो.

मुनादी करने वाले नगाड़ा लेकर नगर-नगर, गाँव-गाँव घूम रहे थे,
किसी ने हिम्मत न दिखाई.
वहीं किसी गाँव में कोई छैल बटाऊ नामक युवक रहता था।
लोकभाषा में पूरा विवरण था- राड़ी माई बटाऊ टुरा.
इसका अर्थ हुआ कि बटाऊ किसी विधवा माँ का इकलौता पुत्र था.
माँ बहुत गरीब थी,
दूसरों के यहाँ चुकिया-पिसिया अर्थात् अनाज बीनने-पीसने का काम कर गुजारा करती थी।
एक छोटी सी झोपड़ी भर थी.
छैल बटाऊ भी राजघराने के पालतू पशु चराता था.
लोग उसे छैल बटोही कुँवर भी कहते थे.
वह सचमुच सदा यायावर और बटोही बना रहता,
अपनी ही धुन में मस्त,
नगर-नगर, गाँव-गाँव घूमता रहने वाला.
पान खाने का शौकीन था.
गाँव की लड़कियाँ व स्त्रियाँ गोबर से उपले व कंडे बनाती थीं,
वे अक्सर उसके पशुओं के गोबर लेने के लिए पान खिलाया करती थीं.

छैल बटाऊ ने जब नगाड़े वालों को पान का बीड़ा लिए घूमते देखा,
तो उसने उत्सुकतावश पान उठा कर खा लिया,
यह सोच कर कि शायद यह राजा के द्वारा किसी उछा मंगल अर्थात् पर्व पर वितरण किया जा रहा है
और यही आखिरी बचा है।

बाद में जब पता चला कि
पान खाने वाले को अवधे नगर की रानी मोहना की सूरत मूरत लानी है,
तो उसने बेहिचक चुनौती स्वीकार कर ली.
राजा के सैनिक उसे लेकर दरबार में आये,
तो राजा बोला-
ये गाँव का गँवार और अनपढ़ लड़का भला अवधे नगर पहुँचेगा
और पहुँच भी जाए, तो भला क्या वह रानी तक पहुँच पाएगा,
रानी तक पहुँच भी जाए, तो भला क्या वह रानी की सूरत-मूरत बनवाने की इजाजत पाएगा.

संदेह स्वाभाविक था,
पर छैल अपने निश्चय पर दृढ़ रहा.
उसके दृढ़ निश्चय को देख कर राजा ने उसे कुछ समय तक शिक्षण प्रशिक्षण के लिए राजमहल में ही रोक लिया.
अलग-अलग तरह की विद्याओं के लिए योग्य गुरु लगा दिये गये,
विभिन्न कौशलों के सामान्य प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षक लगा दिए गए,
कई कलाओं के लिए प्रतिष्ठित कलाकार नियुक्त कर दिये गये.
कुछ ही दिनों में वह अच्छा घुड़सवार और तीरंदाज बन गया.
गणित में इतना कुशल हो गया कि
मुट्ठी में रखी रेत के कण गिन कर बता दे.

जब प्रशिक्षण का कार्य पूर्ण हुआ,
तो बादशाह ने उसके शृंगार के लिए सुनार बुलवाए.
सुनार ने तमाम आभूषण बनाए,
छैल को पहना कर बादशाह को दिखाने ले गया.
बादशाह ने पूछा,
क्या इतने गहनों में छैल मोहना के बराबर लगेगा?

सुनार बोला,
नहीं जहाँपनाह, अभी तो चौदह और बीस का फासला है।
बादशाह बोला-
नहीं, तो फासला मिटा कर ले आओ.

सुनार और खूबसूरत गहनों में जुट गया.
छैल का दुबारा शृंगार कर ले आया,
बादशाह ने पूछा,
क्या अब इतने गहनों में छैल मोहना के बराबर लगेगा?
सुनार बोला,
नहीं जहाँपनाह, अब भी उन्नीस और बीस का फासला है।
बादशाह बोला-
तब ठीक है, आदमी और औरत में इतना तो फासला रहेगा ही.

अब छैल अवधे नगर जाने को तैयार था.
जाते समय बादशाह ने उसे कई चीजें दीं,
मंदराज नामक काबुली घोड़ा,
चन्द्रभान खांडा नामक तलवार
और सोने की मुहरों की थैली व थोकड़ा.

छैल शहसवार बना घर पहुँचा.
माँ पहचान ही न पाई.
जब छैल घोड़ा लिए द्वार से आँगन तक पहुंच गया,
तो वह बोली कि
काश कि आज मेरा बेटा मेरे पास होता,
तो यूँ कोई शहसवार बिना पूछे घर में दाखिल न हो जाता.

तब छैल ने बताया कि वह उसका बेटा ही है.
फिर उसने पीछे की सारी कहानी कह सुनाई।
माँ घबराई, पर उसे खुशी से विदा करने आई.
चलते समय उसके साथ एक पोटली में गुड़-चिउड़ा रख दिया,
ताकि बेटे को राह में भोजन की कुछ जरूरत पूरी हो सके.
छैल ने भी माँ के हाथों में सोने की मुहरों की एक पोटली रख दी,
ताकि उसके वक्त जरूरत काम आ सके.

छैल मंदराज घोड़े पर शहसवार बना,
चन्द्रभान तलवार लिए राजसी वेश में चलता गया.
अवधे नगर के पहले उसे सरलंका और परलंका देशों को पार करना पड़ा,
अंततः चुनौतियों व बाधाओं को पार करते हुए वह अवधे नगर पहुँचा.
वहाँ नगर के बाहर शराब बनाने वाले कलालों की बस्ती थी.
उनमें वह एक संपन्न कलाल के घर जा पहुँचा,
जिसका नाम सोड़ी कलाल था.
उस समय आदमी घर पर नहीं था,
दीपावली आने को थी,
नगर में जुए का माहौल था,
वह नगर जा चुका था।

सोड़ी की पत्नी सोड़ियानी ने छैल को राजा समझ कर उसका स्वागत किया.
छैल बटाऊ ने उससे सबसे पुरानी और तेज महुए की शराब माँगी.
सोड़ियानी ने उसे पंझारी नामक तेज शराब दे दी.
फिर बातों में पता चला कि
सोड़ी और सोड़ियानी बारह साल से विवाहित हैं,
उनकी कोई संतान नहीं है।
दोनों में कुछ ही समय में घनिष्ठता हो गई.
सोड़ियानी ने छैल बटाऊ से उसके आने का उद्देश्य पूछा,
तो उसने सब सच-सच बता दिया.
अंत में जब छैल बटाऊ ने सोड़ियानी से मोहना रानी से मिलने का रास्ता पूछा,
तो उसने उसे सहयोग का वचन दिया.

सोड़ियानी राजमहल में मदिरा लेकर जाती थी।
उसके साथ छैल भी वेश बदल कर जा पहुँचा.
वहाँ उसने झरोखे से मोहना रानी को देखा,
तो मंत्रमुग्ध हो गया.

बाद में पता चला कि
मोहना रानी बाग में कंकन कुइयाँ पर प्रात: स्नान करने आती हैं।
छैल बटाऊ ने राजमहल के उद्यान के सेवकों व सैनिकों को शराब पिला कर बेहोश कर दिया.
फिर वह कंकन कुइयाँ पर जा पहुँचा.
वहाँ उसने जब छिपकर मोहना रानी को स्नान करते देखा,
तो चुपचाप उनकी तस्वीर बना ली.

दीपावली के समय जब सब राजमहल को सजा रहे थे,
तब वह छल या कौशल से रनिवास जा पहुँंचा.
वहाँ जब दीप के प्रकाश में उसने मोहना की मोहिनी मूरत देखी,
तो उससे रहा नहीं गया.
उसने मधुर गीत गाकर मोहना के रूप और अपने प्रेम का वर्णन किया,
साथ ही उसमें अपना परिचय भी दिया.

मोहना ने पहले तो उस परदेशी अजनबी को देख भय व रोष प्रकट किया,
फिर जब उसने फकीरों के साथ बादशाह के पास उसकी मूरत जाने और उसे सब सच-सच बोलते पाया,
तो वह भी मोहित हो गई.

छैल बटाऊ और मोहना रानी मन ही मन एक दूसरे को प्रेम करने लगे.
परंतु इस बीच राजा को पता चल गया.
उन्होंने छैल बटाऊ की हत्या कर दी

छैल के वियोग में मोहना सती होने जा रही थी,
इसी बीच वहाँ से गुजर रहे शिव-पार्वती ने द्रवित होकर उसे जीवित कर दिया.
छैल बटाऊ व मोहना रानी दोनों सरलंका, परलंका होते हुए दिल्ली पहुँचे.
बादशाह अकबर ने दोनों का प्रेम देख कर विवाह करा दिया
और पाँचों फकीरों को भी कैद से आजाद कर दिया.
अंत में छैल बटाऊ-मोहना रानी आधा राज्य पाकर सुखपूर्वक रहने लगे.

----------------------------------
छैल बटाऊ-मोहना रानी की कथा संभवतः महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश व बिहार में भी रही है, परंतु बहुत भिन्न रूप में. यह इस प्रकार है-

किसी समय में एक ब्राह्मण की एक सुंदर युवा पुत्री थी.
वह बिना विवाह के ही गर्भवती हो गई,
अत: सामाजिक मर्यादा के कारण उसके पिता ने उसे जंगल में छोड़ दिया।
पुत्री मर जाना चाहती थी,
किंतु वह गर्भवती थी.
वह वन में किसी तरह रहने लगी.
समय पर उसे एक पुत्र हुआ,
माता दीन दशा में थी.
संयोगवश एक चमार या चमड़े का काम करने वाला सज्जन व्यक्ति वन से गुजर रहा था.
उसने एक माँ को उसके नवजात शिशु के साथ भटकते देखा,
तो उसका परिचय पूछा.
सारी कहानी जान कर वह उसे अपनी पुत्री मानकर अपने घर ले आया.

बच्चा वहाँ पलने लगा.
उसका नाम रखा गया-
छैल बटाऊ.
शायद सुंदर होने के कारण छैल
और राह में मिलने के कारण बटाऊ.
जैसे ही कुछ बड़ा हुआ,
उसके रूप, पराक्रम व कौशल की बातें प्रसिद्ध होने लगीं.
ये बातें वहाँ के इठौरा राजा तक पहुँचीं,
तो उसने छैल बटाऊ को देखने के लिए उसके पिता को बुलाया.
राजा ने देखा कि
छैल बटाऊ के भीतर जो गुण व लक्षण हैं,
वे किसी ऊँचे कुल के दिख रहे हैं।
उन्होंने उसे धन व उपहार देकर छैल बटाऊ को अपनी सेवा में ले लिया।

इठौरा राजा की रानी बहुत सुंदर थी.
वह प्रतिदिन स्नानोपरांत जब आईने के सामने खड़ी होती थी,
तब अपने पिंजरे के तोते से पूछती कि
संसार में सबसे सुंदर कौन है.
तोता स्वामीभक्ति में कहता,
हमारी रानी से बढ़ कर कोई नहीं.

यह बात एक बार एक बिल्ली ने सुन ली.
उसने तोते को धमकाते हुए कहा कि
मोहना रानी के सामने तो तुम्हारी रानी कुछ भी नहीं.
आगे से अगर तुमने झूठ बोला,
तो तुम्हें खा जाऊँगी.

प्राणसंकट में पड़े तोते ने धर्मसंकट में सच स्वीकार कर लिया.
जब रानी ने पूछा,
तो बोला कि
आप सुंदर हैं,
पर मोहना रानी के सामने तो आप तलवे के बराबर हैं.

बात रानी को चुभ गई।
उसने कहा कि अब तो वह मोहना को देख कर रहेंगी.
विषाद से ग्रस्त होकर लेट गईं.
राजा ने हाल पूछा,
तो बोली-
सिरदर्द है, जो केवल मोहना रानी को देख कर ही दूर होगा,
चाहे वो आये या उसकी तस्वीर आये.

राजा अपनी रानी को सिर माथे बिठा कर रखता था।
उसने दरबार में घोषणा कर दी कि
जो भी मोहना रानी की तस्वीर लाएगा,
राजा आधा राज्य दे देगा.

संयोगवश जब और किसी ने चुनौती स्वीकार नहीं की,
तो छैल बटाऊ ने बीड़ा उठा लिया.
उसकी माँ ने जब सुना,
तो वह घबरा गई.
फिर बोली कि
जाने से पहले राजा से एक घोड़ा तो ले लो,
कुछ हथियार और तलवार तो ले लो,
कुछ साथ में सोने की मोहरें तो ले लो.

राजा ने छैल को ये सब चीजें दे दीं.
छैल निकलने को हुआ,
तो चलते समय माँ से बोला कि
कुछ खाने को दे दो.
जो कुछ पहले पहल मिले वही, दे दो.

माँ ने संयोगवश सत्तू निकालने के लिए घड़े में हाथ डाला,
तो वह नमक के घड़े में पड़ा.
छैल ने कहा,
चलो, अब अशुभ हो गया,
जो होगा, आगे देख जायेगा.

छैल लिली घोड़ी पर सवार होकर निकल पड़ा.
रास्ते में कुछ और अशुभ घटित हुए,
पर छैल चलता गया.

आगे किसी कदंब के पेड़ तले सुंदर युवतियों ने उसे छाँव में कुछ पल ठाँव लेने को कहा,
पर वह न रुका.

पता चला कि
मोहना रानी उमदा नगर में रहती थी,
वह एक सुंदर, किंतु विवाहिता युवती थी.
बचपन में उसने खेल-खेल में शिव को अपना पति मान लिया था।
किशोरी हुई,
तो उसका विवाह उमदा नगर में हो गया.
परंतु विवाह के बाद उसे दाम्पत्य सुख न मिला.
मोहना का पति संन्यासी बनकर बाहर चला गया
और ऐसे बारह या पंद्रह साल बीत चुके थे।
मोहना एक नीरस जीवन जीती रही.
घर में बूढ़ी सास थी, जो अंधी थी.

छैल बटाऊ उसके गाँव में आया.
संयोगवश उस दिन वह कुएँ पर पानी भरने आई हुई थी।
छैल बटाऊ प्यासा था.
पनघट पर जा पहुँचा.
छैल ने मोहना से प्यास बुझाने को कहा.
मोहना ने कहा कि
पानी पिलाने के लिए तो
घर में माँ, बहन, पत्नी होती हैं।
पराई औरतों से पानी क्यों माँगता है.
बात कुछ ठिठोली की थी,
छैल ने भी वैसा ही उत्तर दे दिया कि
मैं प्यासा हूँ और तुम्हारे पास ठंढा पानी है,
और फिर मैं कहाँ जाऊँ.
इस दौरान दोनों में बहुतेरे संवाद हुए,
नाज के, अंदाज के.
मोहना अपने घड़े को सोने का बताती,
जो मोतियों लगे जूड़े पर रखा जाता,
रेशम की डोरी से बाँधा जाता.

छैल ने कहा,
ये सब या तो झूठ है,
या मन का सपना भर है.
तुम्हारा घड़ा भी मिट्टी का है, ये देह भी माटी की है।
सब माटी के मोल बिक जाना है।

अंत में मोहना छैल के रूप, वाक्चातुर्य और वैभव से प्रभावित होकर कलश का जल पिलाने लगी.
वह स्वयं भी तो चिरतृषित थी.
पानी के घूँट के साथ छैल ने प्रीति के अमृत का भी स्वाद पाया.
दोनों में प्रेम हो गया.

मोहना छैल को लेकर अपने घर पर गई.
जब मोहना की सास ने सीढ़ियों पर दोहरी आहट सुनी,
तो उसको शक हो गया.
उसने कनफटा योगी को उसके सतीत्व के परीक्षण के लिए बुलवाया.
जोगी ने एक घड़े में किसी जहरीले साँप को डाल दिया।
फिर उसमें अपनी अँगूठी डाल दी
और मोहना से कहा कि
यदि वह धर्म से है,
तो उसको निकाल ले.

मोहना ने अपने आराध्य भुइया देवता और भवानी देवी को साक्षी मान कर वचन लिया कि
यदि मेरे जीवन में भोलेनाथ व परदेसी इन दो केे अतिरिक्त तीसरा पुरुष न आया हो,
तो साँप कुछ न करे.
मोहना की बात द्वयर्थक थी.
सास को उसके बचपन में शिव से विवाह की बात पता थी,
सो वह भी मान गई.
साँप ने भी उसे न डसा.
मोहना ने अँगूठी निकाल कर सास के आँचल में दे दी.

मोहना और छैल बैठ कर प्रेम भरी बातें करने लगे।
परंतु अचानक सालों का गया मोहना का पति लौट आया.
उसने दरवाजे पर आवाज दी.
समय बहुत बीत चुका था।
माँ ने पहचाना नहीं.
बोली कि
यहाँ तो अक्सर कोई मेरा बेटा बनकर आ जाता है।
मैं कैसे पहचानूँ.

तब मोहना के पति ने माँ को अपनी सारी पहचान बता दी,
यह कि कैसे कनफटा योगी की तरह उसके कान छिदे हैं,
कैसे उसके माथे पर जन्मजात टीका है,
उसकी हथेली में छ: उँगलियाँ हैं.
माँ को विश्वास हो गया.
फिर माँ ने उसे मोहना के चरित पर संदेह भी बता दिया.
सारी कथा सुनकर मोहना का पति मोहना के कक्ष में गया.
मोहना ने पति के आने की आहट सुनकर छैल को खिड़की से भगा दिया।

जब मोहना का पति मोहना के कक्ष में गया,
उसने वहाँ सोने की मुहरें रखी देखीं.
वह तलाश करता हुआ बाग में गया.
छैल केवड़ा की गाँछ या पेड़ के पीछे छिपा हुआ था।
मोहना के पति ने पेड़ को हिलाने की कोशिश की,
पर वह न हिला.
तब मोहना के पति ने पेड़ को उसके द्वारा सींचे जाने का वास्ता दिया.
पेड़ ने अपनी आड़ हटा ली,
मोहना के पति ने निहत्थे छैल की तलवार हत्या कर दी.

छैल बटाऊ की हत्या कर मोहना का पति चुपचाप घर में लौट आया.
मोहना को संदेह हुआ.
वह कुछ समय बाद बाग में गई,
तो उसने छैल को मृत पाया.

मोहना ने बाग के माली को चंदन की चिता सजाने को कहा,
उस पर छैल बटाऊ का शव रखा,
फिर उसकी जलती चिता में बैठ कर स्वयं भी प्राण दे दिया.
मरने से पहले उसने अपने पालतू तोते से कहा कि
जाओ और जाकर इठौरा राजा से कहना कि
छैल बटाऊ और मोहना रानी मारे गए।
हो सके, तो वे उनकी चिता की भस्म गंगा में प्रवाहित करवा दें.

कहते हैं,
राजा स्वयं आये,
समस्त दृश्य देख विचलित हुए,
अंतिम संस्कार की वांछित व्यवस्था करवाई.
चिता की भस्म जब गंगा में प्रवाहित करने के लिए लाई गई,
तब सारी कोशिशों के बाद भी छैल और मोहना के अस्थिशेष व भस्म अलग न हो पाए.
जब लोग उनकी भस्म प्रवाहित कर चले गए,
तभी वहाँ से गुजरते शिव-पार्वती की दृष्टि उन पर पड़ी.
पार्वती ने आग्रह किया कि
वे दोनों को जीवित कर दें.
पार्वती ने छैल और मोहना के अस्थिशेष व भस्म पर अपनी कनिष्ठिका उँगली से अमृत छिड़का और शिव ने उन्हें पुनर्जीवित कर दिया.

परंतु पार्वती ने कहा कि
अभी इनकी समस्या हल नहीं हुई.
इठौरा राजा छैल से मोहना रानी को माँगेगा.
अब शिव ने एक और मोहना तैयार कर दी.
एक वास्तविक और दूसरी माया की.

माया की मोहना को पार्वती ने एक लकड़ी के पिटारे में बंद कर दिया.
छैल अब दो मोहना के साथ अपने नगर लौटा.
राजा ने उससे मोहना के चित्र के विषय में पूछा,
तो छैल ने कहा कि
वह मोहना का चित्र नहीं, वास्तविक मोहना को ही ले आया है।
यह कह कर उसने पिटारे से मोहना रानी को निकाल कर प्रस्तुत कर दिया.

राजा ने अपने वचन के मुताबिक छैल बटाऊ को आधा राज्य दिया,
माया की मोहना वहाँ रही,
असली मोहना छैल बटाऊ के साथ रही.
अंत में छैल बटाऊ और मोहना रानी दोनों सदा के लिए एक दूसरे के हो गए.

-----------------------------------
"छैल बटाऊ-मोहना रानी" की पहली कहानी छत्तीसगढ़ में लोककथा के रूप में रही है,
यह कथा वहाँ "मोहना दे गोरी कईना व राड़ी माई बटाऊ टुरा उर्फ छैल बटोही की कहानी" के रूप में प्रसिद्ध रही है।

दूसरी कहानी संभवतः उत्तर प्रदेश या महाराष्ट्र के मूल की है।
इसमें नाम समान हैं, पर कथा भिन्न है।
इससे भी बढ़ कर बात यह है कि
इस रूपांतर में मोहना का चरित्र बहुत बदल जाता है।
उन्नीसवीं सदी के प्रसिद्ध लोककथाविद् व Folktales from Northern India के लेखक पंडित राम गरीब चौबे व विलियम क्रुक द्वारा भी इस कथा को संकलित किया गया था, जिसे बहुत बाद में प्राप्त होने पर साधना नयथानी द्वारा संपादित कर In Quest of Indian folktales के नाम से प्रकाशित किया गया है। इस कहानी को उन्होंने कानपुर के ग्रामीण पुत्ती लोध से सुना था.

दोनों ही कहानियाँ संभवतः मुगल काल से पूर्व की हैं।
क्योंकि अनेक मुगलकालीन चित्रों में छैल व मोहना की कहानी का प्रभाव दिखता है।
यहाँ तक कि जिस कहानी में अकबर का जिक्र जिसमें है, वह भी किसी पुरानी कहानी में बाद का जोड़ है.
संभव है, यह लोकसामान्य में तत्समय बहुत लोकप्रिय रही हो.
पुराने समय में इनकी कथा पर नाटक रचे जाने के प्रचुर साक्ष्य हैं.
यह हिंदी रंगमंच के कुछ प्रारंभिक नाटकों में शुमार है।
पूरने नाटकों में बीच-बीच में कुछ छंद या गीत भी हैं.
प्रसिद्ध चित्रकार राजा रवि वर्मा ने इनकी कथा पर एक चित्र भी बनाया है।
वर्तमान में यह कथा विस्मृत सी हो गई है।

कथा के कुछ रूपांतरों में मोहना की सास ने ही मोहना के पति को सूचना भिजवाई. वहाँ उसके साथ उसका देवर भी है।
कुछ रूपांतरों में मोहना का नाम गोरिया है.
लेखक को कथा के दोनों रूपों का अंतिम अंश समुचित रूप में नहीं मिल पाया,
अंतिम घटनाएँ बहुत संक्षिप्त हैं, जो मूलतः कुछ और विस्तार लिए हो सकती हैं। जो मिला, यथावत् प्रस्तुत है.

"छैल बटाऊ-मोहना रानी" की कहानी में दक्षिण भारत की वीरन-बोम्मि" की कहानी से भी साम्य दिख जाता है। दोनों ही कहानियों में नायक की स्थिति बहुत कुछ समान है। कहानी में कुछ सीमा तक सोरठी-बृजभार की भी छाया दिख सकती है।

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

भर्तृहरि-पिंगला : राग व बैराग की द्विविधापूर्ण प्रेमगाथा

"भर्तृहरि-पिंगला : राग व बैराग की द्विविधापूर्ण प्रेमगाथा"

भर्तृहरि और पिंगला की प्रेम गाथा वैराग्य की पृष्ठभूमि में चलती है 
और इतने रूपांतर रखती है कि 
किसी निष्पत्ति के लिए दुविधापूर्ण हो जाती है. 
जनमानस में इनको लेकर जो कहानियाँ प्रचलित हैं, 
उन्हें मुख्यतः तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-

पहली कहानी में भर्तृहरि रानी पिंगला से प्रेम करते हैं 
और मृगया के समय उनके मना करने के बावजूद मृग की हत्या कर देते हैं। 
मरते-मरते मृग कुछ ऐसा कह जाता है कि 
भर्तृहरि उसके प्रायश्चित में बैरागी हो जाते हैं 
और रानी पिंगला से अनचाहे ही वियुक्त हो जाते हैं। 

दूसरी कहानी में भी राजा मृगया के लिए जाते हैं 
परंतु वहाँ मार्ग में सती का एक दृश्य को देखकर पिंगला की प्रीति की परीक्षा लेना चाहते हैं, 
और मृग के स्थान पर स्वयं रानी पिंगला की मृत्यु हो जाती है 
और आगे की कहानी लगभग यथावत् हो जाती है। 

तीसरी कहानी में पिंगला राजा भर्तृहरि से विश्वासघात करती है 
और उससे मर्माहत भर्तृहरि बैरागी हो जाते हैं. 

एक चौथी कहानी भी है, जो अन्य तीनों को अलग ढंग से जोड़ने का प्रयास करती है. यह कहानी शृंखलाओं के विरोधाभासों को अपनी कल्पना से जोड़ने का यत्न करती है। 
पूर्व दो बहुश्रुत कथाओं की तुलना में यह किंचित् अल्पश्रुत भी है. 
और विस्तृत भी. 

इन कहानियों में भर्तृहरि और पिंगला की गाथा प्रेमकथा के रूप में बहुत दुविधापूर्ण है, 
उनमें एक शृंखला तो पिंगला को पति को गहन प्रेम करने वाली व पतिव्रता के रूप में उनके लिए प्राण देने वाली दिखाती है, 
जबकि दूसरी कथा शृंखला उन्हें पति के साथ छल कर अन्य से प्रेम व व्यभिचार करने वाली सिद्ध कर देती है। 

दोनों धाराएँ लगभग समान रूप से प्रसिद्ध हैं, 
दूसरी मुख्यत: साहित्य के कतिपय लिखित विवरणों में, 
पहली मुख्यत: किंवदंतियों व जनश्रुतियों में. 
एक अन्य तीसरी कहानी भी है, 
जो इन दो कथा शृंखलाओं के विरोधाभासों को अपनी कल्पना से जोड़ने का यत्न करती है। 

अब सबसे पहले पहली कहानी-
एक बार राजा भर्तृहरि आखेट पर गये, 
साथ में उनकी प्रिय रानी पिंगला भी थीं. 
जंगल में बहुत समय तक भटकते रहने के बाद भी मृगया हेतु कोई मृग न मिला. 
दोनों थक कर जब घर लौट रहे थे, 
तभी रास्ते में उन्हें हिरनों का एक झुण्ड दिखाई दिया। 
जिसके आगे एक मृग चल रहा था। 

भर्तृहरि ने उस पर प्रहार करना चाहा,
तभी पिंगला ने उन्हें रोकते हुए अनुरोध किया कि 
महाराज, यह मृगराज सात सौ हिरनियों का पति और पालनकर्ता है। इसलिये आप उसका शिकार न करें। 

भर्तृहरि ने रानी की बात नहीं मानी और हिरन पर बाण चला दिया, 
मरणासन्न होकर भूमि पर गिरते हुए मृग ने 
जाने परमात्मा से प्रार्थना करते हुए या भर्तृहरि से परिवाद करते हुए कहा- 
प्रभु, 
तुमने यह ठीक नहीं किया। 
कुछ पलों में प्राण छूट जाएँगे, 
देह भर रह जाएगी। 
नहीं पता कि 
मेरे प्राण जाने के बाद मेरी काया किस काम आयेगी. 
राजन्, 
संभव है, 
तुमने मुझे अपने भोजन नहीं, 
बस अपनी क्रीडा या शौर्य प्रदर्शन भर में ही मारा हो, 
तुम राजा हो, युद्ध और विलास भर करते आये हो, 
जीवन को व्यर्थ ले सकते हो, 
पर हम वनचर हैं, ऋषि-मुनियों के आश्रमों तक विचरते रहे हैं, 
जीवन को व्यर्थ जाने देने से पीड़ा और गहरी हो जाती है। 

राजा से आशा व्यर्थ है, क्योंकि वही तो मेरा व्याध है, 
प्रभु, हो सके तो मेरी यह साध पूरी कर देना, 
मेरी मृत्यु के बाद 
मेरे ये सुदीर्घ सींग उस श्रृंगी जोगी को दे देना, जो उसके वाद्य बजाता घूमता है, 
मेरे ये सुंदर चंचल नेत्र उस सरल नारी को दे देना, जो प्रीति में निर्मल दृष्टि रखती है। 
मेरा ये कोमल चर्म उन साधु-संतों को दे देना, जो जीवन भर त्याग की साधना करते हैं, 
मेरे पैर उन धावकों और रक्षक सैनिकों को दे देना, जो अदम्य ऊर्जा लिए दौड़ते हैं 
और
इसके उपरांत मांस रही और मिट्टी बनी मेरी देह इस पापी राजा को दे देना, 
जो भोग के लिए प्राण लेने में पीड़ा नहीं जानता. 

हिरण की दर्शनमयी बातें सुनकर भर्तृहरि का हृदय पश्चात्ताप से भर उठा, 
उसकी करुणामयी बातें सुनकर भर्तृहरि का हृदय द्रवित हो उठा। 
पर अब बहुत देर हो चुकी थी. 

किसी ने कहा कि 
वन में ही कहीं गुरु गोरखनाथ का आश्रम है. 
बड़े सिद्ध हैं, संभवतः कुछ निदान बतायें. 

रानी को राजमहल भेज हिरण की देह घोड़े पर रख कर 
वे स्वयं गुरु गोरखनाथ के आश्रम की ओर चल पड़े. 
मार्ग में ही उनकी मुलाकात बाबा गोरखनाथ से हो गई. 
भर्तृहरि ने सादर नमन किया, 
इस घटना से अवगत कराते हुए उनसे हिरण को जीवित करने की प्रार्थना की। 

गोरखनाथ ने कहा- 
मैं एक शर्त पर इसे जीवनदान दे सकता हूँ कि 
इसके जीवित हो जाने पर तुम्हें मेरा शिष्य बनना पड़ेगा। 
कहते हैं, राजा के मन में पहले ही से वैराग्य जाग्रत था, 
उसने सहज ही गोरखनाथ की बात मान ली।

गोरखनाथ ने मृत हिरन को जीवित कर दिया, 
भर्तृहरि उनके शिष्य बन गए. 
राज्य का उत्तराधिकार अपने छोटे भाई विक्रम को सौंपा 
और स्वयं वन में तपस्या करने चले गये. 

परंतु जनमानस उनके वैराग्य को भी इतना सहज नहीं कहता. 
गोरखनाथ ने अपने शिष्यत्व की एक शर्त बतलाई. 
राजा को रानी से पहली भिक्षा लेकर आनी होगी, 
महल जाकर, भिक्षु बन कर, पत्नी को माता कहकर. 

जाने कितने द्वंद्व से गुजर उन्होंने यह स्वीकार कर लिया. 
भगवा धारण करके राजमहल के द्वार पहुँचे, 
रानी पिंगला कहीं खिड़की या झरोखे से देखती दिख गईं. 
रानी पिंगला को इंगित कर राजा भर्तृहरि ने आवाज लगाई- 
अलख निरंजन।
माता पिंगला, भिक्षाम् देहि। 

पिंगला ने पिंगलवेशधारी राजा भर्तृहरि को देखा, 
हृदय स्तब्ध रह गया, 
आँखों से जलधारा बह निकली. 
स्वयं निकल कर आईं, 
कुछ टूटे शब्दों में संवाद किया, 
रोकना चाहा, 
परंतु भर्तृहरि रुके नहीं। 
रानी ने भी चलना चाहा, 
परंतु भर्तृहरि बोले-
संन्यासी सदा एकाकी होता है, ब्रह्मचारी. 
सहचर तो हम गार्हस्थ्य जीवन के थे, 
संन्यास आश्रम के नहीं. 
काफी आग्रह व वार्तालाप के उपरांत जब रानी ने जाना कि
राजा इतने विरक्त हो चुके कि संन्यस्त होकर ही रहेंगे, 
तो उन्होंने भिक्षापात्र में पहली और अंतिम भिक्षा डाल दी. 

भर्तृहरि राज छोड़ योगी बन चले गए, 
पिंगला ने रानी की बनाम वियोगिनी साध्वी का जीवन अपना लिया, 
महल में जोगन ही बनी जीती रहीं. 

दूसरी कहानी सर्वथा भिन्न रूपांतर के साथ आती है। 
इसमें भी राजा भर्तृहरि वन में शिकार खेलने गए थे, 
परंतु रानी पिंगला स्वयं आखेट में न तो राजा के साथ गई, 
न ही वहाँ किसी मृग की घटना हुई। 
वहां मृगया के मार्ग में राजा ने देखा कि 
किसी श्मशान में एक पुरुष की चिता जलाई जा रही थी, 
उसकी पत्नी वहाँ भावविह्वल हुई आई
और उसने अपने मृत पति की चिता में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए। 

राजा भर्तृहरि दृश्य से बहुत व्यथित, चकित व विचलित हो गये. 
सोचा कि क्या कोई स्वेच्छा से प्रिय के वियोग में प्राण देगा? 
अपने महल में वापस आकर राजा भर्तृहरि ने जब ये घटना और मन की दुविधा अपनी पत्नी पिंगला से कही. 
रानी पिंगला पति से बहुत प्रेम करती थी, 
बोली कि 
वह तो यह समाचार सुनने भर से ही मर जाएगी, 
चिता में कूदने के लिए भी वह जीवित नहीं रहेगी। 

राजा भर्तृहरि ने संदेह किया. 
उन्होंने मन ही मन पिंगला की परीक्षा लेने की सोची. 
एक बार जब भर्तृहरि शिकार खेलने गए,
वहाँ से समाचार भिजवा दिया कि 
राजा भर्तृहरि की मृत्यु हो गई। 

ये खबर सुनते ही आहत रानी पिंगला मर गईं, 
राजा भर्तृहरि ने जैसे ही यह सुना, 
वे बिल्कुल टूट गए, 
अपने आप को दोषी ठहराते रहे, विलाप करते रहे. 
परंतु निदान क्या था. 

संयोगवश सिद्ध गोरखनाथ वहाँ उपस्थित हुए। 
उनकी कृपा से रानी पिंगला जीवित हो गई. 
गोरखनाथ की शर्त थी कि
इसके उपरांत राजा को वैराग्य ले लेना होगा। 
राजा सहमत हो गए. 
इस घटना के बाद राजा भर्तृहरि गोरखनाथ के शिष्य बनकर चले गए। 

तीसरी कहानी उक्त दोनों के बिल्कुल अलग ही नहीं, विपरीत भी है,
और यह संभवतः सर्वाधिक प्रसिद्ध है। 
भर्तृहरि के दरबार में एक साधु आया 
तथा राजा के प्रति श्रद्धा प्रदर्शित करते हुए उन्हें एक अमर फल प्रदान किया। 
इस फल को खाकर व्यक्ति अमर हो सकता था,
चिरयुवा बना रह सकता था। 

राजा ने इस फल को अपनी प्रिय रानी पिंगला को खाने के लिए दे दिया, 
किन्तु रानी ने उसे स्वयं न खाकर अपने एक प्रिय सेनानायक को दे दिया. 
उसने भी फल को स्वयं न खाकर उसे उस राजनर्तकी को दे दिया, 
जिससे उसका प्रेम सम्बन्ध था। 
यह अमर फल जब राजनर्तकी के पास पहुँचा, 
उसने इसे राजा को देने का विचार किया। 
वह राजदरबार में पहुँची तथा राजा को फल अर्पित कर दिया। 

रानी पिंगला को दिया हुआ फल राजनर्तकी से पाकर राजा आश्चर्यचकित रह गये 
तथा इसे उसके पास पहुँचने का वृत्तान्त पूछा। 
राजनर्तकी ने संक्षेप में राजा को सब कुछ बतला दिया। 
इस घटना से राजा भर्तृहरि अत्यन्त मर्माहत हुए
और उन्होंने सब कुछ छोड़कर संन्यास लेने का निश्चय कर लिया.

भर्तृहरि की इन तीन कथा शृंखलाओं के अतिरिक्त एक चौथी कथा भी कहीं मिल जाती है, 
जो तीनों कहानियों को कुछ नये किरदार लाकर जोड़ने का यत्न करती है 
और उनके विरोधाभासों को अपनी कल्पना से दूर करने का प्रयास करती है। 

इस कथा के अनुसार भर्तृहरि की दो रानियाँ थीं-
पहली पिंगला, जो पतिव्रता थी और भर्तृहरि से अनन्य प्रेम करती थी। 
दूसरी अनंगसेना, जो राजमर्यादा व दाम्पत्य से परे अनेक से प्रणय संबंध चलाती थी. 

रानी अनंगसेना अपेक्षाकृत युवा व सुंदर थी, 
इस कारण राजा उसे बहुत प्यार करते थे।
परंतु अनंगसेना निष्ठावान न थी. 
उसका राजा के अश्वपालक व सारथि रहे चंद्रचूड़ से भी प्रणय-सम्बन्ध था 
और साथ ही साथ वह राज्य के सेनापति से प्रेम संबध रखे हुए थी। 

चंद्रचूड़ और सेनापति ये दोनों भी ऐसे ही निष्ठाहीन प्रेमी थे, 
दोनों का रानी अनंगसेना और रूपलेखा दोनों से प्रणय-सम्बन्ध था।

योगी गोरखनाथ को पहले से ही पता था कि
राजा भर्तृहरि पूर्वजन्म का योगी है और आगे भी उसको योगी ही बनना है, 
बस पूर्व जन्मों के कर्मों के कारण कुछ दिनों तक का राज और भोग है. 
उन्होंने जब ये सारी बातें जानीं, 
तो उन्होंने जानकर ही किसी जयंत नामक ब्राह्मण के साथ अमरफल भेजा। 
राजा ने वह अमरफल रानी अनंगसेना को दिया।
रानी ने वह अमरफल अश्वपाल चंद्रचूड़ को दे दिया।

चंद्रचूड़ ने भी वह अमरफल स्वयं न खाया, 
उसने उसे गणिका रूपलेखा को देने का निर्णय किया, 
जिसे वह पाना चाहता था, 
किंतु स्तर के कारण पा न सका था। 

वह उस अमरफल को लेकर रूपलेखा के यहाँ गया।
और यह कहकर दे दिया कि 
वो उसको खायेगी, तो अमर हो जायेगी 
और उसका चिरकाल तक यौवन बना रहेगा। 
दूसरे रूपांतर में राजा भर्तृहरि भी रूपलेखा का नृत्य देखने जाते हैं 
और वहीं जब राजा जब मदिरा पीकर मदहोश हो जाते हैं, 
तब चंद्रचूड़ ने रूपलेखा के साथ प्यार करते हुए अमरफल उसको दे दिया. 

रूपलेखा स्वयं के जीवन से घृणा करती थी। 
राजा से नेह व आदर का भाव था. 
सोचा कि वे जियेंगे, तो जाने कितनों का भला करेंगे। 
यह विचार कर वही फल रूपलेखा ने राजा को दे दिया. 

राजा ने जब उस फल को देखा, 
विस्मित व सशंकित हो पूछा कि 
उसने वह फल किससे पाया. 

रूपलेखा ने बता दिया कि 
सेनापति चंद्रचूड़ ने उसको अमरफल दिया था।
क्षुब्ध व क्रुद्ध राजा ने सारथी चंद्रचूड़ से सच पूछा,
तो उसने रानी अनंगसेना के साथ न केवल अपने सम्बन्ध स्वीकार किये, 
अपितु साथ ही साथ उनके सेनापति से भी प्रेमसंबंध होने का भी भेद बता दिया। 

उस दिन अमावस्या की रात थी।
राजा राजमहल पहुँचा और अनंगसेना से प्रश्न किया. 
राजा के भय से अनंगसेना ने सच स्वीकार कर लिया।
राजा ने रानी को मृत्युदंड तो न दिया, 
लेकिन उसी अँधेरी रात में रानी ने आत्मग्लानि में आत्मदाह कर लिया।
चंद्रचूड़ व सेनापति को या तो मृत्युदंड दे दिया गया
या फिर देशनिकाला दे दिया गया. 

इस घटना के उपरांत भर्तृहरि बहुत खिन्न व उदास रहने लगे. 
इस पर उनकी बड़ी रानी पिंगला ने मानसिक व्याकुलता से बाहर निकलने के लिए उनको आखेट के लिए वन में भेजा।
परंतु दुर्योगवश आखेट के समय उनका एक सैनिक सर्पदंश से मारा गया. 
जब उसका शव उसके घर पहुंचा, 
तो उसकी पत्नी उसकी देह के साथ सती हो गई। 

तेजी से चले यह सारा घटनाक्रम देख 
राजा बहुत द्वंद्व में पड़ गया।
एक स्त्री थी अनंगसेना, 
जो राजा की पत्नी व प्रिया होकर भी अनुचरों तक से व्यभिचार करती है 
और 
एक स्त्री है रूपलेखा, 
जो संसार के लिए व्यभिचारिणी वेश्या होकर भी 
देश के राजा के प्रति जीवन और यौवन से बढ़कर प्रेम रख रही है। 
एक और नारी है,
उस साधारण सैनिक की पत्नी, 
जो पति की देह के साथ सती हो गई। 
और एक और नारी है पिंगला, 
जो पति द्वारा किसी और रानी को अमरफल दिये जाने की बात जानकर भी उसकी चिंता कर रही है, 
परंतु क्या पता, 
वह भी छल या दिखावा भर ही हो. 

वे सोचने लगे कि 
क्या मेरी पत्नी पिंगला भी मुझसे इतना प्यार करती है। 
आगे कहानी यथावत् है. 
राजा भर्तृहरि ने परीक्षा के लिए अपनी मृत्यु की मिथ्या सूचना भिजवाई, 
जिसे सुनते ही रानी पिंगला मर गई । 

कहानी त्रासदी के साथ समाप्त होती है। 
एक रानी अपने झूठ से मारी गई, 
अपना ही अभेद्य पश्चात्ताप लेकर, 
दूसरी रानी राजा के झूठ से मारी गई, 
राजा को अभेद्य पश्चात्ताप देकर. 

अंत में गुरु गोरखनाथ की शरण में शांति मिलती है। 
धर्म सदा ही प्रेम के टूटों की श्रेष्ठ शरण बनता रहा है। 
भर्तृहरि न प्रेम में आहत पहले राजा हैं, न प्रेम में विरक्त पहले योगी. 
परंतु दोनों के जोड़ ने उनकी प्रेमगाथा को अन्य प्रेमगाथाओं में शिखर लोकप्रियता प्रदान कर दी. 

--------------------------------
कहानी के तीन मूल रूपांतरों में से पहली दो कहानियों में मूल दोषी भर्तृहरि हैं, जबकि तीसरे रूपांतर में पिंगला. 
पहली कहानी में हत्या का करुणामय प्रायश्चित है, 
दूसरी कहानी में मृत्यु का वियोगमय पश्चात्ताप है, 
तीसरी कहानी में रानी के विश्वासघात से उपजी विरक्ति. 

संभवतः यह तृतीय छलपरक कथारूप ही अधिक प्रसिद्ध हुआ. 
भर्तृहरि के वैराग्य के पीछे स्त्री के विश्वासघात की कहानी का आधार उनका यह श्लोक है-
यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता, 
साप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः। 
अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या, 
धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च॥ 

अर्थ है-
जिसका मैं निरंतर स्मरण करता रहा, 
वह किसी और का स्मरण करती रही, 
वह भी किसी और को ही प्रेम करता रहा, 
उसकी चाही भी फिर मुझे चाहती रही, 
धिक्कार है, उसे भी, उसके चाहे को भी, उसको चाहने वाले को भी, मुझको चाहने वाले को भी
और सबसे बढ़कर प्रीति के समस्त व्यापार को भी. 
इससे यह तो स्पष्ट है कि 
भर्तृहरि की विरक्ति में कहीं तो प्रीति की अतृप्ति रही है, 
जो उन्हें मुक्तिपथ पर ले जाने की प्रेरिका बनी. 

किंवदंती के अनुसार रानी पिंगला सिंहल देश की राजकुमारी थी. 
जिन कहानियों में वे छोटी रानी हैं, उनमें वह अधिकांशतः चरित्रहीन है, 
जिन कहानियों में वे बड़ी रानी हैं, उनमें वह अधिकांशतः पतिव्रता हैं. 
भर्तृहरि की इन रानी का संबंध किससे था, या किस-किससे था, 
यह किंवदंतियों में अलग-अलग है. 
कहानियों में अंत:पुर के दरोगा से नगर कोतवाल तक
और सेनापति से नगरसेठ तक संबंध के किस्से हैं. 

कुछ कहानियों में पिंगला को भर्तृहरि के बैरागी बन जाने की भविष्यवाणी पता थी
और उसने आखेट पर जाने से उन्हें रोका भी था, 
परंतु अंततः वही हुआ, जो नियति ने लिख रखा था। 

कथा है कि भर्तृहरि पूर्व जन्म में योगी ही थे.
उस समय भी वे गोरखनाथ या मत्स्येंद्र नाथ के शिष्य थे. 
किसी अप्सरा को देखकर मुग्ध हो गए, 
तो स्वयं गुरु ने अगले जन्म में उन्हें राजा व अप्सरा को पिंगला बनाकर भेजा. 
कुछ के अनुसार अनंगसेना भर्तृहरि की पत्नी का नहीं, 
उस अप्सरा का ही नाम था. 
पिंगला के द्वैध चरित्र चित्रण को व्याख्यायित करने के लिए 
यह भी कथा है मूल पिंगला तो पतिव्रता थी 
और शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त हो गई. 
भर्तृहरि के मोह को समाप्त करने के लिए गुरु ने माया कि पिंगला रच दी. 

कहते यह भी हैं कि
भर्तृहरि के लिए ज्योतिषियों ने पहले ही कह रखा था कि
17 वर्ष की आयु में इनका विवाह होगा 
और 18 वर्ष की उम्र में ही ये योगी बन जाएंगे. 
16 वर्ष तक इन्होंने ज्ञानार्जन किया,
सचमुच 17 वर्ष की आयु में विवाह भी हो गया.
इसके उपरांत उन्होंने राजकाज मूलतः भाई विक्रमादित्य के भरोसे छोड़ स्वयं भोग-विलास में लीन हो गए.
कहीं यह भी प्रसिद्ध है कि 
राजा भर्तृहरि के तीन रानियाँ थीं,
जिनमें अनंगसेना सबसे छोटी रानी थी.
इनमें अंतिम रानी के चरित्र के प्रति यद्यपि छोटे भाई विक्रमादित्य ने राजा भर्तृहरि को अनेक बार सचेष्ट किया था,
तथापि उसके प्रेम पाश में आबद्ध होने के कारण भर्तृहरि ने उसके क्रिया-कलापों पर ध्यान नहीं दिया था। 
कहते तो यहाँ तक हैं कि
अनंगसेना के प्रभाव में भर्तृहरि ने विक्रमादित्य को कुछ समय तक राज्य से बहिष्कृत भी कर दिया था। 

इधर भर्तृहरि भोग-विलास में लीन देख 
गुरु गोरखनाथ के गुरु मत्स्येंद्रनाथ ने उन्हें आज्ञा दी कि
पूर्व जन्म के इस योगी को भोग से मुक्त करने का मार्ग दिखाना चाहिए 
और इसी कारण गोरखनाथ ने ही अमर फल राजा भर्तृहरि के पास भिजवाया था.

अमर फल के विषय में एक कहानी यह भी है कि 
उज्जयिनी में जयंत नाम का एक ब्राह्मण रहता था। 
घोर तपस्या के परिणामस्वरूप उसे इन्द्र से अमर फल की प्राप्ति हुई थी. 
उसने सोचा कि यह फल उससे अधिक उसके राजा के लिए उपयुक्त है, सो देने चला आया था. 

पिंगला की मृत्यु के विषय में एक कहानी यह भी है कि 
भर्तृहरि ने अनंगसेना के छल के पश्चात् ही संन्यास ले लिया था, 
परंतु उनका मन पिंगला से मुक्त न हो पाता था. 
पिंगला भी विरहाकुल थी. 
भर्तृहरि ने मोह की मुक्ति के लिए पिंगला को अपनी मृत्यु की सूचना दे दी 
और पिंगला सचमुच शोक से मारी गई. 
भर्तृहरि को व्यथा तो बहुत हुई, 
परंतु मोह का अंतिम बंधन भी छूट गया। 
वे बैरागी संतों के शिरोमणि से बन गए. 

राजा भर्तृहरि के संन्यासी जीवन के संबंध में भी दोहरी कथाएं प्रसिद्ध हैं. 
एक के अनुसार वह बिल्कुल संयमित व बहुत ही कठोर साधक बने, 
दूसरे के अनुसार बार-बार साधना पथ से विरत हो गृहस्थ आश्रम में लौटते रहे. 
भर्तृहरि के विषय में कहीं यह भी प्रसिद्ध है कि उन्होंने सात बार संन्यास लिया और फिर वापस गृहस्थ आश्रम में लौटे, 
वहीं दूसरी ओर यह कहानी भी प्रसिद्ध है कि
गुरु ने उनकी परीक्षा के लिए उन्हें मालवा से मरुभूमि में भेज दिया. 
वहाँ उन्हें तपती रेत पर नंगे पाँव चलना पड़ा, 
काँटों पर चलना पड़ा, 
भूखे-प्यासे रहना पड़ा, 
पर वे विचलित न हुए. 
अंत में गुरु ने माया का महल बना
सुंदर युवतियां, सुस्वादु व्यंजन, मधुर-मादक पेय सब रखे, 
पर भर्तृहरि मोहित न हुए. 
गोरखनाथ बोले, 
‘नहीं भर्तृहरि! अनादर मत करो। 
तुम्हें कुछ-न-कुछ तो लेना ही पड़ेगा, 
कुछ-न-कुछ मांगना ही पड़ेगा।' 

भर्तृहरि को रेत में एक चमचमाती हुई सूई दिखाई दी। 
उसे उठाकर वे बोले, 
‘गुरुजी! कंठा फट गया है, 
सूई में यह धागा पिरो लेने दीजिए,
ताकि मैं अपना कंठा सी लूं।'

गोरखनाथ ने भर्तृहरि को गले लगाते हुए बोले-
वत्स, तुम तो उस परीक्षा में भी सफल रहे, 
जिसमें एक समय तुम्हारे गुरु के गुरु भी बँध गए थे। 
तुम सचमुच सिद्ध हो. 

राजा भर्तृहरि का काल सुस्पष्ट नहीं है। उज्जयिनी में पहली शताब्दी में भर्तृहरि नाम के एक राजा का होना संभवतः सबसे पुष्ट ऐतिहासिक तथ्य है. शकार्य विक्रमादित्य से संबंध होने या विक्रमसंवत् के प्रारंभ के आधार पर कुछ विचारक इनका समय ई.पू. पहली सदी तक मानते हैं, जबकि गोरखनाथ से संबंध होने के आधार पर कुछ विचारक उन्हें 11वीं-12वीं सदी का सिद्ध करते हैं। कुछ अन्य विचारक विभिन्न संदर्भों व अनुमानों से उनका समय प्रायः 450 ई० या 550 ई० या 650 ई० भी बताते रहे है। इत्सिंग भर्तृहरि का उल्लेख भारतीय बौद्ध दार्शनिक दिङ्नाग के साथ करते हैं और भर्तृहरि को भी बौद्ध दार्शनिक बताते हैं. ऐसे में ऐतिहासिक रूप से न्यूनतम दो भर्तृहरि का होना सिद्ध होने लगता है। 

परंतु भर्तृहरि की ऐतिहासिकता सिद्ध भी हो जाए, 
तो उससे इस कथा की ऐतिहासिकता सिद्ध नहीं होती. भर्तृहरि की कहानी मुख्यतः जनश्रुतियों, लोकनाट्यों व लोकगीतों में ही सुरक्षित रही है। 
भविष्य पुराण में भी कहानी का द्वितीय संक्षिप्त रूप है। 
लोकभाषा में राजा भर्तृहरि राजा भरथरी हैं. वे लगभग उतने ही प्रसिद्ध हैं, जितने गुरु गोरखनाथ. लोकगाथाओं और लोकगीतों में तो इनकी कहानी बहुत ही लोकप्रिय रही है, किसी प्रेमी से भी अधिक. 
पहले पौष मध्य से लेकर मकर संक्रांति तक के शीतकालीन मलमास में कई जोगी घूम-घूमकर राजा भरथरी की कथा सुनाते थे. गोरखनाथ जी की वैरागी नाथ परंपरा के अनेक योगी सींगवाद्य रखते हैं, 
जिसे वे सेली कहते हैं। माना जाता है कि ये भर्तृहरि की परंपरा के योगी हैं. ऐसा कहा जाता है कि नाथपंथ के वैरागी नामक उपपंथ के भर्तृहरि ही प्रवर्तक थे। चीनी यात्री इत्सिंग के अनुसार इन्होंने बौद्ध-धर्म ग्रहण किया था, परंतु अन्य सूत्रों के अनुसार ये अद्वैत वेदान्ताचार्य थे। वाक्यपदीय के भाष्यकार कैय्यट के अनुसार भर्तृहरि का मूलनाम हरि था, प्रजा के भरण-पोषण का विशेष ध्यान रखने के कारण नाम में भर्तृ लगा दिया गया। 

भर्तृहरि ने श्रृंगार, वैराग्य और नीति के तीन शतक लिखे, 
जो "भर्तृहरि शतकत्रय" के नाम से प्रसिद्ध हैं. 
इसके अतिरिक्त उनका व्याकरण दर्शन पर आधारित वाक्यपदीय नामक प्रौढ़ ग्रंथ भी मिलता है.
वाक्यपदीयम्‌ तीन कांडों में निबद्ध पद्यबद्ध रचना है, जिसमें स्फोटवाद का विशद प्रतिपादन है। 
इसके अतिरिक्त व्याकरण पर दो और ग्रंथ हैं -
प्रथम‌- वाक्यपदीयवृत्ति:, जो वाक्यपदीयम्‌ के पहले दो कांडों पर स्वयं भर्तृहरि का भाष्य है. 
द्वितीय— महाभाष्यदीपिका. यह पाणिनीय अष्टाध्यायी पर पतंजलि के महाभाष्य का उपभाष्य है, जो अपूर्ण रूप में प्राप्त होता है।
कुछ लोग भट्टिकाव्य के रचयिता भट्टि से भी उनका ऐक्य मानते हैं।
इस मत के अनुसार भट्टिकाव्य के प्रणेता का नाम भट्टि वस्तुत: भर्तृ का ही अपभ्रंश है. परंतु यह सर्वस्वीकार्य नहीं है। 
अनेक विद्वानों के अनुसार वैयाकरण दार्शनिक भर्तृहरि सूक्तिकार भर्तृहरि से अलग हैं. 

शतकत्रय की दृष्टि से भर्तृहरि संस्कृत मुक्तक-काव्य परम्परा के अग्रणी कवि हैं। 
इनकी भाषा सरल, व भावाभिव्यक्ति इतनी सशक्त है कि 
उनकी उक्तियाँ सूक्तियों के रूप में बहुश: दुहराई जाती रही हैं। 
सूक्तियों व संदेश परक कथाओं के लिए प्रसिद्ध पंचतंत्र तक में उनके 
नीतिशतक के कुछ श्लोकों को ग्रहण किया गया है। 
माना जाता है कि शतकत्रय में श्रृंगार और नीति के शतक तो वे वैराग्य पूर्व ही लिख चुके थे, 
परंतु वैराग्यशतक को वैराग्य के उपरांत लिखा. 

राजा भर्तृहरि मूलतः कहां के रहने वाले थे, यह पूर्णतः स्पष्ट नहीं है.
जनसामान्य का अधिकांश वर्ग यह मानता है कि 
वे उज्जैन के रहने वाले थे.
जो लोकप्रसिद्ध है वह यह है कि 
मालवा में अवन्ति के राजा गंधर्वसेन या चंद्रसेन के दो रानियों से दो पुत्र थे-
बड़ी रानी से बड़ा पुत्र भर्तृहरि
और
छोटी रानी से छोटा पुत्र विक्रमादित्य.
इन्हीं विक्रमादित्य के लिए विक्रम और वेताल की कहानी भी प्रसिद्ध है.
इस कहानी में भी इसी प्रकार से राजा को साधु से अलौकिक फल मिलने की एक घटना है, जिससे कथा का सूत्रपात होता है.

किसी कहानी के अनुसार भर्तृहरि गंधर्वसेन की रानी नहीं, 
दासी के पुत्र थे, 
परंतु उनकी परवर्ती स्थिति देखते हुए यह मत कम मान्य लगता है। 

भर्तृहरि के एक बहन भी थी-
मयनावती, 
जिससे वे भिक्षा लेने गए थे। 
मयनावती का पुत्र गोपीचंद व पुत्री चंद्रावल भी कालांतर में भर्तृहरि के शिष्य बन गये थे, 
जिनकी अलग गाथा है। 
कहीं बहन का नाम मानवती भी मिलता है। 

भर्तृहरि की जन्मभूमि माने जाने वाले उज्जैन में 
अब स्मृति रूप कुछ अधिक शेष नहीं.
उज्जैन से 12 किमी दूर कालियादह महल की ओर 
9 गुफाएँ बनी हैं, 
जिनमें ग्यारहवीं सदी में परमारवंशी राजाओं ने 
कभी मंदिरवत् स्थापत्य सहित स्तंभों पर मूर्तिशिल्प भी बनवाए थे। 
उनमें चार तो लगभग ध्वस्त हो चुकी हैं। 
क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित एक गुफा में, 
जो भरथरी की गुफा के नाम से जानी जाती है।  
माना जाता है कि यहां भर्तृहरि ने तपस्या की थी। 
गुफा के अंदर ही पत्थर का एक पाट टूटा हुआ लटकता हुआ दिखाई देता है, 
जिसके लिए एक कहानी प्रसिद्ध है। 
कहते हैं, 
भर्तृहरि की तपस्या से इंद्र का सिंहासन भी डोल गया था। 
उनकी तपस्या भंग करने के लिए इंद्र ने एक पत्थर गिराया,
जिसे भर्तृहरि ने हाथ का टेक लगा कर रोक दिया था। 
उस पर उनके हाथ का निशान बन गया। 
वह निशान आज भी उस पत्थर पर अंकित है।

गुफा में भर्तृहरि की प्रतिमा लगी है,
जो बहुत बाद में कभी लगा दी गई। 
साधना स्थल के पास एक और गुफा है,
जिसके बारे में मान्यता रही है कि 
यहां से एक रास्ता चार धाम के लिए जाता था। 
दंतकथा है कि भर्तृहरि जब समाधि से उठते थे, 
तो वे चार धाम की यात्रा करते थे. 

इधर राजस्थान के अलवर जिले के मालाखेड़ा तहसील में इंदोक ग्राम में एक भरथरी टीला है, 
जिस पर भर्तृहरि का मंदिर बना हुआ है। 
मान्यता है कि यहाँ कभी भर्तृहरि ने योग साधना की थी. 
यहाँ उनके भाँजे गोपीचंद ने भी उनके साथ ही तप किया था। 
बहन चंद्रावल भी संन्यास ले यहाँ तक आईं थी. 
इन दोनों के संन्यस्त जीवन की अपनी गाथा है। 
भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की अष्टमी अर्थात दुर्गाष्टमी को यहाँ लक्खी मेला लगता है। 

इसके अतिरिक्त यहाँ अलवर में ही तिजारा में भी उनकी तपोस्थली है. 
मान्यता है कि यह तिजारा प्राचीन त्रिगर्तनगर है. 
यहाँ भर्तृहरि व गोपीचंद दोनों ने तप तो किया, 
पर भिक्षा न मिली. बस एक कुम्हार ने भोजन दिया 
और कुम्हारन ने उस पर भी आपत्ति कर दी. 
इसके प्रतितोष में भर्तृहरि ने कुम्हार के आधे घड़े सोने के कर दिये
व कहा कि यदि कुम्हारन ने उससी निष्ठा दिखलाई होती, 
तो सारे ही घड़े सोने के हो गए होते. 

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के चुनारगढ़ किले में भी भर्तृहरि की समाधि है. वस्तुतः प्राचीन महान व्यक्तित्वों से जुड़े स्थल हर क्षेत्र में मिल जाते हैं. यह उनकी ऐतिहासिकता से अधिक लोकप्रियता का निदर्शक है. 

भर्तृहरि के पिता गंधर्वसेन के लिए प्रसिद्ध यह भी है कि
वे मूलतः उज्जयिनी नहीं, 
राजस्थान में चाकसू के निवासी थे
और भर्तृहरि का जन्म भी यहीं हुआ था। 
ये बाद में उज्जयिनी के राजा बने. 
गंधर्वसेन की कहानी अलग से वर्णित है। 

भर्तृहरि के पिता गंधर्वसेन, 
भ्राता विक्रमादित्य, 
बहन चंद्रावल व बहन के पुत्र गोपीचंद
सबकी स्वतंत्र लोकगाथा है
और इस तरह लोकगाथाओं वाला यह संभवतः सबसे लोकप्रिय परिवार है।