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मंगलवार, 8 नवंबर 2016

दीपावली : अमावस्या की सिद्धि से संपदा की दीपमाला तक

"दीपावली : अमावस्या की सिद्धि से संपदा की दीपमाला तक"

सांस्कृतिक पर्व बहुरंगी होते हैं,
बहुत दिशाओं में यात्रा करते हैं,
और बहुतेरे रूप लेते चलते हैं.

हिंदू संस्कृति चूँकि किसी भी अन्य परंपरा से अधिक पुरातन और मिश्रित है, अत: उसमें वैविध्य भी सर्वाधिक है. इनमें दीपावली के अवसर पर उसके रूप परिवर्तन व परिवर्धन की ओर चलते हैं,
जिसका अनेक अन्य हिंदू पर्वों की तरह
क्रमिक शास्त्रीयकरण व लौकिकीकरण हुआ है -
आदिम युग में नीरव एकाकी साधना से लेकर
आधुनिक युग में पटाखों के शोर में खोने तक.

माना जाता है कि
प्रारंभ में आहारसंग्राहक या आखेटक युग तक यह आदिम कबीलों का पर्व था,
जब अमावस्या की रात्रि में जादू-टोना, तंत्र-मंत्र की क्रिया होती थी, सम्मोहन, उच्चाटन, वशीकरण के लिए दीप जला कर काजल बनाया जाता था. उल्लू का वाहन माना जाना कहीं यहीं से जुड़ा है. इसमें लक्ष्मी की बजाय श्री की उपासना की जाती थी और तब यह उत्सव से अधिक अमा में सिद्धि का अवसर था. आज भी हिंदू तांत्रिक परंपरा इसे सर्वाधिक महत्ता देती है.

सिद्धि चूँकि शक्ति की देवी की नहीं, सौंदर्य की देवी की होती, अत: उसका स्वरूप नवरात्र से भिन्न होता, जहाँ नववसंत में कामनाएँ प्रतिफलित होने की अपेक्षा अधिक होती. सौंदर्य की देवी का पर्व कामना का पर्व न बनता, तो शायद उसकी सार्थकता खो जाती- "प्रियेषु सौभाग्यफला ही चारुता."

पुनः वैष्णव भक्ति काल में यक्षों की देवी लक्ष्मी से श्री का एकीकरण कर दिया गया और कुबेर के स्थान पर गणेश को प्रतिष्ठित कर दिया गया. तब यह सिद्धि की बजाय समृद्धि का पर्व बन गया. दिवस या कहें रात्रि वही रही,
परंतु पूरा चरित्र बदल गया. यहाँ यह भी सिद्ध या प्रसिद्ध किया गया कि समुद्र मंथन में लक्ष्मी इसी दिवस को निकलीं थीं. धन्वंतरि की त्रयोदशी जब अर्थ व भाव बदलकर धनतेरस बन गई, तो दो दिन बाद अमावस्या को लक्ष्मी का प्राकट्य मानकर लक्ष्मी का पर्व बना दिया जाना कठिन न था. संभावना अधिक है कि इस रूप में यह मूलत: यक्षसंस्कृति का उत्सव रहा हो, जिसे आर्य संस्कृति ने पूर्वपरंपरा में जोड़ने की सहज स्वीकृति दे दी हो.

कृषि व वाणिज्य के विकसित युग में यह समृद्धि का द्योतक बन गया, क्योंकि अब कृषकों के लिए खरीफ की फसलें बहुत हद तक तैयार थीं, पशुपालकों के लिए चारागाह हरे-भरे थे, समुदाय के एक बड़े वर्ग के लिए आशाएँ जगी हुई थीं.
और इसी क्रम में यह नववर्ष का पर्व भी बना, जो कम लोगों को ज्ञात है. आज भी दक्षिण के अनेक पुराने संवत् कार्तिक से प्रारंभ होते हैं. परंपरागत वणिक् वर्ग आज भी इस दिन को वित्तीय वर्ष का प्रारंभ मानते हुए बही खोलता है.

कुछ सामयिक जरूरतें भी थीं- भोजन, वस्त्र एवं आवास की.
हाल की बीती बारिश में बिखरे और कलई उतरी दीवारों वाले घरों को सर्दियों के लिए ढकने सँजोने का काम भी करना था, तो यह साफ सफाई रंग रोगन का त्यौहार भी बन गया.
बदलते मौसम में सबके लिए गरम कपड़े खरीदने थे. नये अन्न और व्यंजन के लिए बर्तन जुटाने थे. तब सर्दियाँ अधिक गहरी होती थीं, इसलिए साधन अधिक जुटाकर रखने होते थे. फलत: लेनदेन का कारोबार बढ़ जाता.
व्यापारी वर्ग को यह सुहाता कि अभी से लेन देन के लिए लोगों को तैयार कर ले, क्योंकि धंधा उम्मीदों की उधार पर भी तो चलता है.

जो हो, सिद्धि का एकाकी और प्रच्छन्न सा रहने वाला दीप
संपदा के सान्निध्य में बहुल व बहिर्मुखी हो गया,
पूजागृह या गर्भगृह से निकलकर द्वार तक पहुँच गया,
ताकि लक्ष्मी आ सकें. अब यह प्रकाशपर्व बनने को तैयार था, क्योंकि संपदा हो, सौंदर्य हो, दर्शन व प्रदर्शन चाहता है.

अगले क्रम में महाकाव्य काल में जब रामायण में राम के स्वगृहगमन के समय दीपोत्सव की कथा मिली, तो इसे संयोगवश इसे पूर्वप्रचलित लक्ष्मी के दीपपर्व से जोड़कर दीपावली का उत्सव बना दिया गया. कालांतर में यह भी प्रचलित कर दिया गया कि पांडव अपना 12 साल का वनवास काट कर इसी दिन वापस आये थे.
और फिर दीपमाला घर के द्वार से दीवार तक जा पहुँची, संख्या में बढ़कर, लौ की लड़ी बनकर.

और फिर वो प्रदेश , जहाँ के लोग व्यापार व जीविका की तलाश में प्रवासी हो गए थे, उन लोगों के परदेश से वापस अपने देश लौटने का पर्व भी बन गया, जो आज के गतिशील समाज में भी बदस्तूर कायम सा है.

संस्कृति की दीवारों पर शुभ-लाभ के प्रतीक सजने लगे हैं,
चाक से उतरकर दीये चौपाटियों पर सजने लगे हैं.
ये अगणित दीप अनगिनत सालों से अनगिनत कहानियों और मान्यताओं के साथ जलते रहे हैं.
मान्यता कहती है-
जब दूर से आए के लिए अनेक दीप सजते हैं,
तो दूर गए के लिए एक प्रतीक्षा का दीप भी जलता है,
और सच कहूँ,
तो अंतर्मन कहता है कि
वह एकाकी दीप राम का नहीं, लक्ष्मण के नाम का है
और
वह लक्ष्मी की प्रतीक्षा में नहीं, उर्मिला की प्रतीक्षा का जला है,
जिसने अपने हृदय सिंहासन पर एक पादुका रख रखी है,
उस पति की, जिसे पति के साथ उसके पदचिह्नों पर चलने का अधिकार नहीं मिला,
बस उसके पदचिह्नों को निहारते रहने की सुदीर्घ प्रतीक्षा मिली.

बुधवार, 2 नवंबर 2016

राम और श्याम : चरित और चरित्र के द्वैताद्वैत

"राम और श्याम : चरित और चरित्र के द्वैताद्वैत"



परंपरा कहती है,
दीपावली राम के गृह-नगरागमन का पर्व है,
इसके दूसरे दिन गोवर्धन पूजा आती है,
कृष्ण की गृहनगर-रक्षा का पर्व बन कर.
यह कुछ विस्मयजनक है.
जन्मदिवस के रूप में मनाए जाने वाले
रामनवमी और जन्माष्टमी से परे भी दोनों के दो पर्व हैं-
राम की विजयादशमी और दीपावली,
कृष्ण की गोवर्धन पूजा और होली.
इनकी अपनी समानताएं हैं,
उनके व्यक्तित्वों की तरह ही.

परंतु चरित्र की दृष्टि से राम और कृष्ण बहुत भिन्न हैं,
इतने कि राम और श्याम के विपरीत नायक चरित्र गढ़े जा सकें,
सीता और गीता जैसी नायिकाएं कल्पित की जा सकें.

राम और कृष्ण
हिंदू परंपरा के सबसे लोकप्रिय ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य वाले देव हैं.
दोनों चरित की दृष्टि से बहुत कुछ एक से हैं,
इतने कि दोनों एक ही देव विष्णु के अवतार माने गए हैं,
दोनों श्याम वर्ण हैं,
नीलाभ और कमनीय.
सुंदर इतने कि अनजाने भी मुग्ध हो जाएँ.
दोनों ने नदीतट पर जन्म लिया,
दोनों को अल्पायु में घर छोड़ना पड़ा,
दोनों का यौवन यायावर सा बीता,
दोनों को महायुद्ध का सहभागी बनना पड़ा,
दोनों को शासक न रहते समय बर्बर शासकों से संघर्ष करना पड़ा,
ऐसे तमाम का हंता बनना पड़ा, जो राक्षसवत् थे,
दोनों का अपने भ्राता से अगाध स्नेह रहा,
दोनों के जन्म में पितृपक्ष धर्मसंकट में है,
दोनों का बालकाल राक्षसों से युद्ध के बावजूद मधुर है,
दोनों के यौवन में प्रव्रजन का संघर्ष है,
और
दोनों का प्रौढकाल समस्त परिजनों की सहमृत्यु का विषाद लिए है।

पर समानताओं में कितनी भिन्नता लिए हैं-
एक त्रेतायुग के हैं, दूसरे द्वापर के,
एक सूर्यवंशी हैं, दूसरे चंद्रवंशी,
एक मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, दूसरे लीला पुरुषोत्तम,
एक का जन्म ग्रीष्म में हुआ, दूसरे का वर्षा में,
एक का दोपहर में, दूसरे का मध्य रात्रि में,
एक वरिष्ठ पुत्र हैं, दूसरे कनिष्ठ पुत्र,
एक विश्वामित्र के शिष्य हैं, दूसरे संदीपनि के,
एक के लिए शबरी के बेर हैं, दूसरे के लिए गोपियों के मक्खन,
एक ने सरयू तट पर जीवन आरंभ किया, दूसरे ने यमुना तट पर,
एक धनुर्धर बने, तो दूसरे चक्रधर और वंशीधर,
एक में त्याग का आदर्श, दूसरे में भोग का विमर्श,
एक मुख्यतः निवृत्तिमार्गी, दूसरा मुख्यतः प्रवृत्तिमार्गी,
एक ने संसार में रहकर अध्यात्म का आदर्श अपनाया,
दूसरा अध्यात्म का आदर्श बताकर संसार की राह चला.

एक ने वन और वचन के लिए राज छोड़ा,
उत्तर से दक्षिण चलते हुए सागर तक गए,
चौदह वर्ष के लिए,
दूसरे ने नये राज्य के गठन और समुदाय की रक्षा के लिए राज छोड़ा,
पूरब से पश्चिम चलते हुए सागर तक गए,
सदा के लिए.

कृष्ण के चरित में युवा प्रेम का मंचन है, बालसुलभ लीला है,
उनके समर का भी मंचन हो सकता है, लीला हो सकती है,
पर वहाँ से शौर्य कम, दर्शन अधिक निकलता है।
यहाँ तक कि बालकाल में कंस के अतिरिक्त कोई ऐसा राक्षस नहीं है,
जिसकी सचमुच कोई राक्षस रूप में सिद्धि की जा सके,
उनकी कोई पूर्व-प्रसिद्धि पाई जा सके.

परंपरा कहती है, मानव रूप में
राम और कृष्ण का अपना कर्म-भोग है,
राम के लिए जो स्त्रियाँ मुग्ध हुईं,
कृष्ण के समय गोपिका बनकर जन्मीं.
राम का बालिवध इस युग में उनके लिए
व्याध का तीर बनकर लगा.

राम और कृष्ण का भेदाभेद बहुत कुछ
रामायण और महाभारत का भेदाभेद है.
कृष्ण के साथ कपट और व्यूह भरी महाभारत है,
पर उसमें अलग से दर्शन भरी गीता है.
राम के साथ मर्यादित रामायण है,
पर उसमें जीवन से अलग कोई दर्शन नहीं है.

रामायण व महाभारत
एक ही परंपरा के दो दिव्य ग्रंथ,
एक ही देव के दो अवतारों की गाथा,
परंतु दोनों के लिए अलग आदर क्यों कि
महाभारत को जगह देने से बचना चाहें
और
रामायण को जीवन में रचना चाहें.

मान्यताएँ और किंवदन्तियाँ तो बहुत हैं कि
महाभारत रखने से घर में महाभारत शुरू हो जाती है
और
रामायण पढ़ने से जीवन में रामायण उतर आती है.

रामायण का हर आदर्श ही नहीं, आदर्शहीन पात्र तक
एक सीमा तक अनुकरणीय है,
महाभारत का आदर्शहीन तो दूर, आदर्श पात्र तक बहुत सीमा तक उपेक्षणीय है.

रामायण के युद्ध में भी धर्म है,
महाभारत के धर्म में भी युद्ध है,
रामायण की आधी कहानी त्याग से त्याग की है,
वहाँ स्वत: आदर उमड़ आता है,
महाभारत की आधी कहानी भोग से परिग्रह की है,
वहाँ स्वत: कुत्सा उमग आती है.
महाभारत के शब्दों भर में गीता है,
रामायण के आचरण में गीता है.

वैसे कुछ व्यावहारिक कारण भी हैं,
रामायण बढ़कर जुड़कर भी 24 हजार श्लोकों तक पहुँची,
महाभारत बढ़ते जुड़ते 24 हजार से 1 लाख श्लोकों तक पहुँच गया,
इतने महाकाय ग्रंथ को लाना, पढ़ना भी तो दुष्कर है.
शायद इसीलिए कृष्णकथा की 24 हजार श्लोकों की भागवत अधिक प्रसिद्ध हुई.

अब दूसरी दृष्टि से देखें,
कितने घर होंगे,
जिनमें वाल्मीकि की रामायण होगी,
जो समस्त रामकथाओं का मूल है
और
वैसे कितने घर होंगे,
जिनमें कृष्ण की गीता न होगी,
जो मूलत: महाभारत का ही अंश है.

एक दृष्टि से
जीवन और जगत्
रामायण और महाभारत का योग है,
कुछ रामत्व भी, कुछ कृष्णत्व भी,
कुछ आदर्श भी, कुछ यथार्थ भी,
कुछ शास्त्र भी, कुछ लोक भी,
कुछ गांभीर्य भी, कुछ माधुर्य भी,
कुछ दाम्पत्य की निष्ठा भी, कुछ प्रेम की लीला भी,
कुछ ज्योति की दीपावली भी, कुछ रंगों की होली भी.

इसी चरितार्थता के संदर्भ में एक मध्यकालीन ग्रंथ का रूपक स्मृत हो आया है।
कांचीपुरम के 17वीं शती के कवि श्रीवेङ्कटाध्वरि का लिखा एक विस्मयजनक ग्रंथ है,
"श्री राघवयादवीयम्"
इसमें राम व कृष्ण दोनों की कहानी है,
पर संयुक्त रूप में एक ही ग्रंथ में, एक ही श्लोक में.
मात्र 30 श्लोकों की इस पुस्तक को सीधे-सीधे पढ़ते जाएँ,
तो रामकथा बनती है
और
विपरीत (उल्टा) क्रम में पढ़ने पर कृष्णकथा बन जाती है।
इस कारण इस ग्रन्थ को ‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है।
कई बार लगता है,
यह अनुलोम-विलोम काव्य ही नहीं,
जीवन का भी सत्य है,
सीधी राह चलिए,
जीवन में रामायण ही लाएँगे,
त्रिभंगी बनिए,
महाभारत को उतरता पाएँगे.

सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

कृष्ण की सोलह कलाएँ : गोवर्धनधारण के बहाने एक दीर्घ शोध"

"कृष्ण की सोलह कलाएँ : गोवर्धनधारण के बहाने एक दीर्घ शोध"


सुना है,
कृष्ण की सोलह कलाएँ हैं,
क्या हैं, कहीं गिनती मिलती है,
क्यों हैं, इनकी किंचित् व्याख्या भी मिलती है,
पर बहुत सटीक नहीं लगती.
वैसे तो चरित्र की बजाय चरित को देखें,
तो कृष्ण के साथ सोलह कलाओं की बजाय आठ अंक अधिक जुड़े दिखते हैं-
-अष्टमी को जन्म हुआ,
-आठवें पुत्र के रूप में हुआ,
-आठवें अवतार के भी रूप में हुआ,
-बालकाल में पशुरूप आठ असुरों का वध भी किया-
(वकासुर, अघासुर, वत्सासुर, धेनुकासुर, अरिष्टासुर, वृषासुर, प्रलंबासुर और केशि.)
-आठ भार्याएँ रहीं-
(रुक्मिणी, सत्यभामा, मित्रवृंदा, जाम्बवती, कालिंदी, भद्रा और लक्ष्मणा.)
-आठ भार्याओं से आठ पुत्र हुए.
संयोग से अब तक ऊपर जिन 8 अंकों का मुख्य संयोग बताया गया,
वे भी कुल 8 ही होते हैं.
कुछ ने गणित आगे तक जोड़ा है.
-उनकी 16100 रानियाँ थीं,
जिसका आंकिक योग 8 होता है।
-उनकी वर्णित आयु 125 वर्ष थी,
जिसका आंकिक योग भी 8 होता है।
-इसके आगे भी उनका देहावसान आयु के 8वें माह के 8वें दिन हुआ था.
उनका प्रसिद्ध अवतारवादी श्लोक
"संभवामि युगे-युगे" भी चतुर्थ अध्याय का 8वाँ श्लोक है।
पर यह सब कुछ खींचतान लगता जाता है।
जन्म संयोग से साल के छठे माह में हुआ,
दो माह बाद होता, तो 8वें माह में होता.
वैसे कम ही लोग ध्यान देते हैं कि
साल के 8वें माह में भी कृष्ण से जुड़ा एक व्रत मनाया जाता है,
कृष्ण जन्माष्टमी के ठीक दो माह बाद यह व्रत आ जाता है।
लोक परंपरा के अनुसार यह 'अहोई' माता का व्रत है।
यह अहोई शब्द अष्टमी से बना है।
जैसे कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी चौथ माता बन गई,
वैसे ही कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी आहोई माता बन गई.
अष्टमी का संबंध दुर्गा से भी है,
पर सर्वाधिक संबंध कृष्ण से है।
संभवतः व्रत बहुत लोकप्रिय नहीं है।
कम से कम बहुत व्यापक तो नहीं ही है।
व्रत के विधान व कहानी दोनों करवा चौथ से हूबहू मिलते से लगते हैं,
बस मुख्य अंतर है कि
करवा चौथ मूलतः पति के लिए है,
अहोई संतान के लिए.
कल्पना या कामना यह रही होगी कि
मेरी संतान कृष्ण सी हो.
सोलह कलाओं की ओर लौटते हैं.
ऐसे तो गणना में भगवान के भी छ: ऐश्वर्य ही हैं,
जिनमें कुछ इन कलाओं में समाहित भी हैं,
तो शायद यहाँ कृष्ण की भगवत्ता भगवान से भी बढ़कर दिखानी रही हो.
कोई और अवतार सोलह कलाओं वाला नहीं है।
कृष्ण को इसीलिए कुछ भक्त पूर्ण अवतार मानते हैं,
अन्य को अंशमात्र.
ईश्वर मानव बने, तो कुछ मानव की कलाएँ भी तो जुड़ेंगी,
केवल उसकी दुर्बलताएँ ही थोड़े ही जुड़ेंगी.
किसी समय मानव की चौंसठ कलाएँ गिनी गईं थीं,
अब तो असंख्य हो गई होंगी।
जब हर हुनर कला बन जाए,
तो वह चौंसठ भर कैसे रहेगा?
दृश्य व श्रव्य ही नहीं, हर इंद्रियानुभूति में कला आ सकती है।
पर संस्कृति कहती है कि मानव बने इस ईश्वर की भी सोलह ही कलाएँ थीं.
छ: भगवान की और दस मानव की ऐसी गणना तो उचित नहीं.
वैसे छ: ऐश्वर्य की गणना भी तार्किक नहीं,
न ईश्वरीय रूप से, न मानवीय रूप से.
बस वह किसी काव्यात्मक कल्पना से आई है।
यह कहना कठिन है कि
ये सोलह कलाएँ मानवीय हैं या ईश्वरीय,
प्राकृतिक या अलौकिक,
समस्त में या विशिष्ट.
कहीं ईश्वर की सोलह कलाओं की गणना में अष्टसिद्धियों की तरह अलौकिक क्षमताएँ भी दी गई हैं-
अतिशायिनी, विपरिणामिनी, संक्रामिणी, प्रभ्वी, कुण्ठिनी, विकासिनी, मर्यादिनी, आह्लादिनी, स्वरूपावस्थिति, परिपूर्ण आदि,
पर ये भी न व्यवस्थित हैं, न तार्किक.
कुछ श्रुतियाँ ब्रह्म की सोलह कलाएँ बताते हुए कहती हैं कि
परमात्मा की सोलह कलाओं में एक कला अन्न में मिलकर अन्नमय कोश के द्वारा प्रकट हुई-
षोडशानां कलानामेका कलाऽतिशिष्टाभूत् साऽन्ने-नोपसमाहिता प्रज्वालीत्।
यजुर्वेद कहता है कि
मनुष्य के सोलह विशिष्ट गुणों या शक्तियों को भी षोडशकला कहते है-
“सचते स षोडशी”—-(यजुर्वेद–8.36)
शतपथ ब्राह्मण स्पष्टत: कहता है,
यह चंद्रमा, यह मानव, यह ब्रह्म, सब कुछ षोडशकला युक्त हैं-
—(षोडशकलो वै चन्द्रमः, षोडशकलो वै पुरुषः, षोडशकलो वै ब्रह्म, षोडशकलं वा इदं सर्वं —शतपथ ब्राह्मण)
प्रश्नोपनिषद् के छठे प्रश्न में पंचेंद्रियों के साथ प्राण और कतिपय अन्य गुणों व तत्वों की संख्या जोड़कर सोलह कलाएँ बनाई गई हैं,
पर वे सुसंगत नहीं लगतीं.
ऋग्वैदिक पुरुष सूक्त में पुरुष रूप में ब्रह्म के चार चरण हैं.
ब्रह्म के तीन चरण उर्ध्व में विद्यमान है और एक चरण ही इस विश्व में है।
कुछ विचारकों ने इन चार चरणों में प्रत्येक के चार उपचरण मानकर सोलह कलाएँ दिखाने की कोशिश की है.
बहुत सुसंगत न होने पर भी यह सोलह की संख्या तो पहुँचा ही देता है।
कहने को सोलह की संख्या में षोडश मातृकाएँ भी हैं,
पर कृष्ण को उनसे जोड़ना कठिन होगा।
उन्हें माताओं की बजाय प्रियाओं से जोड़ा जाए,
तो संख्या सोलह हजार से चौसठ हजार तक
या फिर सोलह लाख तक भी पहुँचाई जा सकती है,
पर माताएँ दो से अधिक जुड़नी बढ़नी कठिन हो जाती हैं.
एक अन्य तर्क है कि
कृष्ण की जितनी लीलाएँ प्रसिद्ध हैं,
वे सोलह वर्गों में रखी जा सकती हैं-
-कारागार में दैवीय जन्म व मुक्ति की, यमुना पारगमन की,
-नंद-यशोदा का लाल बनने की, माता के साथ बाललीला की, बालगोपाल संग मक्खनचोरी की, मुख में ब्रह्मांडदर्शन कराने की, यमलार्जुन मुक्ति की
-पूतनावध, कंसवध व अन्य असुरवध की, कालियादमन की, रणछोड़ बन कालयवनवध की, नरकासुर वध की,
-गोवर्धनधारण कर इंद्र से गोकुल की रक्षा करने की, नवधर्मप्रवर्तन की,
-गोपिकाओं के चीरहरण, केलि, महारास की,
-राधा संग प्रीति की,
-संदीपनि आश्रम गमन व सुदामा मैत्री की,
-रुक्मिणीहरण व शिशुपालवध की,
-स्यमंतकमणि का लांछन पाने की, शेष-सप्तभार्यावरण की,
-गोकुलवृंदावन छोड़ द्वारकाधीश बनने की,
-द्रौपदी के चीरहरण में वस्त्रदान कर लज्जा निवारण की,
-दुर्योधन के समक्ष संधिप्रस्ताव लाने पर विराट्-रूप दिखाने की,
-पांडव वनवास काल में दुर्वासा के दस हजार शिष्यों को अक्षयपात्र से भोजन कराने की,
-महाभारत युद्ध में सेना कौरव पक्ष में भेज सारथि बन अर्जुन के साथ युद्ध का सूत्रधार बनने की,
-अर्जुन विषाद में विश्वरूप दर्शन की,
-युद्धोपरांत कुलसंहार के साथ महाप्रयाण करने की,
पर यह वर्गीकरण भी न पूर्णसंतोषजनक नहीं है।
एक सरल कल्पना है कि
कृष्ण चंद्रवंशी हैं,
और
चाँद की सोलह हैं,
तो उनकी क्यों न हों?
यह तर्क अभिमान से आ सकता है, प्रेम से नहीं.
प्रेम तो कहेगा,
चंद्रवंशी होने से हों न हों,
जब चाँद में है,
चाँद जैसे में क्यों न हों?
अब चाँद की सोलह कलाएँ क्या हैं-
तिथिवार उसकी बदलती आकृतियाँ.
यों तो तिथियाँ पंद्रह होती हैं;
किंतु प्रतिपदा से चतुर्दशी तक 14 तिथियाँ दोनों पक्षों मे उभयनिष्ठ हैं।
इनमें चंद्रमा के घटने -बढने की 14 कलाएँ होती हैं।
अमावस्या और पूर्णिमा ये दोनों दो कलाएँ हो गयीं ।
अतः चंद्रमा की सोलह कलाएँ हुईं ।
चंद्रमा के कलाओं का वर्णन कुछ इस प्रकार है:-
1. अमृता
2. मानदा
3. पूषा
4. तुष्टि
5. पुष्टि
6. रति
7. धृति
8. शशिनी
9. चन्द्रिका
10. कान्ति
11. ज्योत्स्ना
12. श्री
13. प्रीतिरङ्गा
14. पूर्णा या पूर्णामृता
कहीं इनके अतिरिक्त दो और का वर्णन मिलता है- स्वरजा और अंगदा, पर अमा और पूर्णिमा को वही नाम देना ठीक है.
वैसे ये नामकरण न तो कृष्ण के लिहाज से पूरी तरह सटीक बैठते हैं,
न ही चाँद के लिहाज से.
व्याख्या में जरा खींचतान कर लें,
यह और बात है.
एक और सरल कल्पना हो सकती है कि
यह कला सौंदर्य की हो सकती है,
पर सोलह श्रृंगार तो स्त्रियाँ करती रहती थीं,
षोडशी होने के बाद वही बने रहने में सुखानुभूति पाती थीं.
कृष्ण के सौंदर्य में भी वैसा ही शृंगार है.
कोई कह सकता है,
सौंदर्य की कला का भगवत्ता में ऐसे पृथक् स्मरण क्यों कर.
पर मन का एक हिस्सा कहता है,
जिसके भी सौंदर्य में चाँद देखा जा सकता है,
उसके सौंदर्य में सोलह श्रृंगार देखा जा सकता है.
सच कहूं तो
मन यदि कलाएँ तर्क भरे दर्शन से खोजे,
तो वह उलझा रह जाएगा।
वह यदि प्रेम की दृष्टि से देखे,
तो हृदय में आठ प्रहर उस कलामय सुंदरतम के दर्शन पाएगा-
काजल लागे किरकरो, सुरमा सहा न जाए।
जिन नैनन में कृष्ण बसे, दूजा कौन समाये।।

रविवार, 30 अक्टूबर 2016

दीप एकाकी, अपंक्ति का

"दीप एकाकी, अपंक्ति का"


दीपावली आज छोटी है,
कल बड़ी हो जाएगी।
आज एक दीप जलेगा,
कल दीपों की अवली होगी,
पूरी पंक्ति, माला, हार सी, कतार सी.
दीप एकाकी हो,
तो पूजन के लिए है, ध्यान के लिए है, त्राटक के लिए है,
पूरी शृंखला सी हो, तो उत्सव के लिए है, सौंदर्य के लिए है,
शृंखला का दीप परंपरा का है,
एकाकी दीप वैयक्तिक भी हो सकता है,
अपनी निजता में जलाना चाहें, तो जला सकते हैं,
न जलाते हों, यह और बात है.
पर वे किसी अदृश्य में तो जलते ही रहते हैं।
संभव है,
तमस् के समक्ष दीपों की अवली के समक्ष
एकाकी दीप की दीप्ति उतनी दूर तक सशक्त न हो,
पर वह हवाओं के समक्ष दीपों की अवली भी उतनी ही निर्बल है,
जितनी कि एकाकी दीप की लौ.
और समय के समक्ष भी एकाकी दीप की दीप्ति उतनी ही देर तक सशक्त है,
जितनी कि बहुतेरे दीपों की अवली.
दीप के तले अँधेरा है,
यह लोकोक्ति में है,
पर उसके शीर्ष पर धूमाच्छादित अँधेरा है,
यह लोकोक्ति में नहीं है,
दीप के लौ के मध्य में उसकी वर्तिका के पास भी अँधेरा है,
यह भी लोकोक्ति में नहीं है.
कहने को दीप नहीं जलता,
उसकी बाती जलती है,
उसका तेल जलता है.
उसकी देह नहीं जलती,
उसकी आत्मा जलती है,
उसका हृदय जलता है।
दीप का अपना अंतर्मन है,
यह एक रूपक है,
अंतर्मन का अपना दीप है,
यह दूसरा रूपक है।
दीपक का एकाकीपन एक अलग भाव रखता है,
उसका पंक्तिपन दूसरी कविता रचता है।
दीप का एकाकीपन उसमें एकाग्रता लिए है,
ये दीप नजर टिकाने के लिए हैं, भटकाने के लिए नहीं.
पर यह दीप का अहम् भी बन सकता है,
अज्ञेय की पंक्ति की तरह-
"यह दीप अकेला स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता, पर
इसको भी पंक्ति को दे दो।"
ऐसे ही "दीपदान" पर टैगोर की एक कविता है,
पर भाव बहुत भिन्न हैं-
नायिका दीप लेकर मंदिर में आती है.
नायक कहता है- "मैं अँधेरे में हूँ, एक दीप मुझे दे दो!"
नायिका दीप को शिखर पर झूलते आकाशदीपों में झुला कर चली जाती है.
दूसरे दिन नायिका दीप लेकर सरोवर तट पर आती है.
नायक फिर कहता है- "मैं अँधेरे में हूँ, एक दीप मुझे दे दो!"
नायिका दीप को सरोवर में बह रहे अनगिनत दीपों  में बहा  कर चली जाती है.
तीसरे दिन नायिका दीप लेकर देहरी पर आती है.
नायक कहता है- "मैं अँधेरे में हूँ, एक दीप मुझे दे दो!"
नायिका दीप को दीवारों और झरोखों में जगमगा रहे अनगिनत दीपों में सजा कर चली जाती है.
निराश नायक को
"तमसो मा ज्योतिर्गमय" से आगे
"आत्म दीपो भव !" का स्वर सुनाई पड़ता है
और वह अज्ञात की ओर निकल पड़ता है.
एक दिन वह किसी वृक्ष के नीचे निष्कंप दीपशिखा सा शांत बैठा है-
नायिका अनजला दीपक लिए आई.
नायक बोला- "आज ये दीपक?"
नायिका बोली-
"तब मैं संसारिकता की लौ जलाये घूम रही थी
और तुम दीपक की तरह जल रहे थे,
अब तुम्हारे भीतर दीपक जल रहा है,
जिसकी अलौकिकता की लौ लेने आई हूँ."
(अंत में गीत की कथा में किंचित् परिवर्तन के साथ)

बुधवार, 19 अक्टूबर 2016

करवा चौथ : चार चाँदों की कहानी

"करवा चौथ : चार चाँदों की कहानी"

करवा चौथ पति की मंगलकामना का व्रत है।
हर व्रत की तरह इसमें कुछ कर्मकांड है, कुछ कथा है.

सबसे पहले कर्मकांड-
व्रत उपवास की दृष्टि से कठिन है,
पर विधान की दृष्टि से सरल है.
करवा चौथ को संस्कृत में "करक चतुर्थी" कहा जाता है.
करक भी कलश का रूपांतर या पर्याय है,
जो लोकभाषा में करवा है।
कलश भी दो हैं,
एक मिट्टी का, अन्न से भरा,
एक धातु का, जल से भरा.
दोनों शुभत्व के लिए हैं।

करवा चौथ का नामकरण करवा पर है,
पर वह व्यवहार में जरा गौण है,
प्रमुख तो चाँद है,
उसको झीने से आवृत्त कर रही चलनी या छलनी है,
उसके इस पार, उस पार दो जन हैं,
एक दूसरे के चाँद बने हुए.

यूँ तो चंद्रमा अधिकांशत: वंकिम ही होता है,
किंतु चतुर्थी का चंद्रमा कुछ अधिक ही वंकिम होता है
उसका यह टेढ़ापन शुक्ल पक्ष के तुलना में कृष्ण पक्ष में
उसे कुछ अधिक ही बेडौल कर जाता है.

परंपरा में चतुर्थी का चंद्रमा अशुभ है.
फिर चाँद के सामने खड़ा पति किस रूप में है ?
परंपरा में स्त्री पति को समक्ष रखकर
चलनी की ओट में उस चाँद को देखती है,
वह उसके अशुभत्व को स्वयं पर लेती है.
स्त्री के द्वारा दुआएँ करना भी दरअसल कई बार
"बलाएँ लेने" की एक पुरानी रीति का संस्कृति अनुमोदित हिस्सा है,
जिसमें स्त्री प्रार्थना करती है कि
उसके पति या पुत्र पर कोई संकट न आए,
और यदि वह टल न पाए,
तो उनकी बजाय स्वयं मुझ पर ही आ आये.
यह प्रेम का त्याग है,
जो सुख-दु:ख का बँटवारा अलग ढंग से करता है,
सुख देना चाहता है,
दुःख लेना चाहता है.

अब कथा-
करवा चौथ की कुल चार कहानियाँ हैं,
जिनमें दो तो एक जैसी हैं और प्रसिद्ध भी वही हैं.
करवा चौथ की यह कहानी भी ज़रा विचित्र है.
कहानी मूल व्रत की पृष्ठभूमि नहीं बताती,
उसका माहात्म्य बताती है,
वह भी प्रीति से नहीं, भीति से,
बहुत कुछ सत्यनारायण व्रत की कथा की तरह.

व्रत में कहानी सुनना अनिवार्य है,
पर वह बहुत श्रवणीय नहीं है,
कम से कम पति-पत्नी के प्रेम की दृष्टि से तो नहीं ही है.
वस्तुतः तीन-चौथाई तो यह कथा
ननद-भाभी के मध्य प्रतिस्पर्धा सी है
और
आगे एक चौथाई व्रताधिदेव विनायक का प्रतिशोध है,
व्रतभंगकर्त्री बहन का प्रायश्चित है.

ननद-भाभी के मध्य प्रतियोगिता भी इस पर आधारित है कि
किसका रिश्ता गहरा है और कौन अधिक विश्वसनीय है.
भाई-बहन बनाम पति-पत्नी की प्रतिस्पर्धा में
बहन अपने पति के संकट की साक्षी बनती है।
फिर उसका व्रत एक दिन का नहीं,
एक वर्ष का तप बन जाता है।

कहानी सात भाइयों की प्यारी बहन के मायके में रहने
और भाइयों के कहे अनुसार व्रत तोड़ने से प्रारंभ होती है।
भाई भूखी-प्यासी बेहाल होती बहन को निजात दिलाने के लिए
चाँद उगने से पहले ही सामने के पेड़ पर
छलनी की ओट में दीप जलाकर
उसे ही चाँद दिखा कर व्रत तुड़वा देते हैं।

फिर गणेश का प्रतिशोध प्रारंभ होता है।
बहन के पति तत्काल रुग्ण ही नहीं होते,
वरन् मृत्यु को भी प्राप्त हो जाते हैं।
कहानी में पति की सुरक्षा का बोध तो प्रबल है,
पर उसके प्रति अनुराग भी प्रबल हो,
ऐसा कहीं सीधे नहीं दिखता.
प्रकारांतर से पृष्ठभूमि में गणेश की भूमिका है,
जो किसी समय के विनायक हैं और विनायक का संस्कृत में अर्थ होता है-
खलनायक.
तब वे उपास्य हैं, शनि की तरह,
न पूजो, तो बुरा कर देंगे।

हम देवों की आराधना दो रूपों में करते हैं-
सकारात्मक रूप में उनसे प्रेम के कारण
नकारात्मक रूप में किसी अन्य से बचाव के कारण
जैसे शनि को हनुमान का व्रत नकारात्मक रूप में शनि से बचाव के कारण किया जाता है,
तो मंगल को सकारात्मक रूप में उनसे प्रेम के कारण.
चतुर्थी के चन्द्र को प्रायः अशुभ माना जाता था,
अतः गणेश की पूजा इस दिन उसके अशुभ प्रभाव से बचने के लिए किया जाता है.

कहानी की नायिका, उसकी विनायिका भी है
और कहानी के अधिकांश रूपों में वह अनामिका है.
शायद परंपरा अभिशप्त का नाम न लेना चाहती हो.
कुछ जगहों पर उसका ही नाम "करवा" रखा मिलता है
और व्रत के नाम व विधान से यह सुसंगत भी लगता है।
कहानी के एक रूपांतर में उसका नाम वीरावती है.
यहाँ वीरा शब्द वीर की बजाय भाई का वाचक अधिक लगता है।
इस रूपांतर में वह वणिक् वर्ग से नहीं,
अपितु विप्र वर्ग से है.
व्रतभंग के शाप से मुक्ति का विधान इंद्राणी सुझाती हैं,
नायिका मनोयोग से व्रत करती भी है,
पर कहीं भी नायिका को सती अनसूया या सावित्री या बिहुला का दर्जा प्राप्त नहीं है,
वह जैसे अपराध का प्रायश्चित कर रही हो,
उस पाप का, जो हुआ ही नहीं,
हुआ भी, तो जानकर किया ही नहीं.

प्रायश्चित के उपरांत गणेश या चतुर्थी माता की कृपा से सब मंगल हो जाता है,
पर कहानी के कुछ रूपांतरों में ननद-भाभी का द्वंद्व जारी रहता है।
वहाँ स्वयं भाभी ही बहन के पति को पुनर्जीवित करती है,
वह भी बहुत मनुहार और कलह के बाद,
अपनी कनिष्ठिका उँगली से अमृत पिला कर.

एकबारगी तो ऐसा लगता है जैसे
सारी गाथा ननद को मायके से ससुराल भेजने की कथा है,
जो निष्कर्ष ये देती है कि
बहन को भाइयों के स्नेह पर भरोसा कम से कम ही करना चाहिए,
वरना अपना घर संकट में पड़ेगा.
प्रतिद्वंद्विता के बीज बहुत स्पष्ट हैं,
इसीलिए ये एकमात्र कथा है,
जिसे पंडित नहीं, पड़ोसिनें सुनाती हैं.

दो अन्य कहानियों में एक इसके आगे का माहात्म्य है,
जिसमें कोई पुरुष नदी में मकर द्वारा पकड़े जाने पर
करवा का नाम लेकर मुक्त हो जाता है।

सही परिदृश्य जानने के लिए
कहानी को रक्षाबंधन की पृष्ठभूमि में रखकर देखा जाना समीचीन होगा,
जो वर्षा ऋतु में आता है।
यह मुख्यत: वह समय था,
जब नवविवाहिता कन्याएँ मायके आतीं थीं,
कजली के लिए, झूले के लिए.

करवा चौथ का समय वर्षा के समापन व शरदारंभ का समय है,
कन्या का वर्षा कालीन चातुर्मास पूर्ण होने को है,
उसे अपने पतिगृह के लिए विदा होना चाहिए।
कहानी में कुछ छिपी सी कहानी यह भी है.

कहानी का लौकिक विस्तार बहुत है,
परंतु पौराणिक आधार नगण्य है।
बस जनश्रुतियों में चलती आई इस कहानी में
न तो बहुत दार्शनिक विश्लेषण की संभावना है,
न ही कोई संस्कृतगत या साहित्यिक परिष्कार के बहुत अवसर.

कहानी से फिर व्रत विधान की ओर लौटते हैं,
प्रश्न उठता है कि चाँद दर्शन के लिए छलनी ही क्यों?
कहानी में बहन को दीप को चाँद उसके सामने छलनी रख कर ही किया गया था,
परंपरा शायद उसे चाँद के सामने दुहराती है
या फिर इसलिये भी कि
फिर से कोई छल से झूठा चाँद न दिखला जाए,
पहले झिलमिल में झाँक लें,
फिर पूरा तस्दीक कर लें.
मूल वजह शायद यह है कि कि
चाँद का अशुभत्व छलनी से छनकर क्या पता कुछ कम हो जाए.

आज करवा फिल्मों से फैशन तक फैल चुका है,
इनमें जरा कोरी दिखती रीति के पीछे कुछ गहरी भावना तलाशते हैं।
एक दृष्टि से करवा चौथ प्यास जगाने का व्रत है,
वहाँ जहाँ अतृप्ति है, वह और प्रखर हो जाए,
जहाँ तृप्ति है, वह नीरसता में न धरी रह जाए.

कुछ पुरानी पंक्तियाँ स्मृत हो आईं हैं-

दिवस भर की क्षुधा-पिपासा
जब प्राणों को कंठ तक लाए,
चतुर्थी का वंकिम चंद्रमा जब उदित हो,
और मेघ छलनी बन छाए,
तब देखना चार चाँद बनते हैं-

वह जो नभ में है,
अनगिनत की प्रीति का मौन द्रष्टा बनकर,
वह जो कर में है,
दृश्य के लिए हाथ की झिलमिल छलनी बनकर,
और दो और हैं,
छलनी के दोनों पार,
द्रष्टा भी, दृश्य भी, परस्पर के दो चाँद बनकर.

देखो,
अर्घ्य देना जब चाँद को,
तब उस चाँद को देना,
जो आकाश में निकला है
और
खड़ा है-- छलनी के पार.

पर
तृषा बुझाना जब जल ले,
उस चाँद को ही देना,
जो अंतस् में खिला है
और
बैठ गया है-- छलनी होने-करने के बावजूद.