मंगलवार, 22 मई 2018

वन्दे मातरम्...!


वन्दे मातरम्...!

माँ !
तुम इस सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ कृति हो और इस संसार की सबसे महत्वपूर्ण इकाई भी। तुम जीवन की स्रोत हो क्योंकि जीवन तुम्हीं से होकर जन्म पाता है और जन्म से आगे भी दूर तक तुम्हारी ही छाया में पलता है। तब तक जब तक कि हम दोनों में से एक की मृत्यु न हो जाए। छाया निश्चय ही बचपन की अनिवार्यता है, पर छाया से मुक्त होना ही यौवन की पहचान है।(1) तुम भी तो इस छाया से अलग हुई थी और कहीं दूर जाकर तुमने अपनी जड़ें जमाई थी। माँ! मैं आज तुझसे दूर होकर भी तेरे निकट आना चाहता हूँ, ताकि हमारे जीवन का मूल अपने जीवन की जड़ता से मुक्त हो सके।(2)
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(1)   Kehlil Gibran- The love of a parent for child is the love that should grow towards separation.
(2) Erich Fromm- The mother-child relationship is paradoxical and in a sense, tragic. It requires the most intense love on the mother side, yet this very love must help the child grow away from the mother and to become fully independent.

माँ !
जीवन जिस संसर्ग से उत्पन्न होता है, वही तुम्हारे उत्सर्ग से पावन हो जाता है। मातृत्व ही तुम्हारे स्त्रीत्व को गरिमा दे देता है, अन्यथा तुम भी पुरुष की तरह बस एक साधारण मानव होती।(1) अपनी इस महत्ता के बावजूद तुम इतनी साधारण हो कि इसके कसीदे पढ़ने की जरूरत नहीं, इसके गौरव ग्रन्थ गढ़ने की आवश्यकता नहीं। इस जीवन ने ही जीवन के इस उत्स को जैविक रुप देकर सहज और सुखद बना दिया है। फिर भी मैं आभारी हूँ, उससे भी अधिक जितनी कोई भी माँ अपनी माँ की रही होगी।
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(1)  Nancy Friday - When I stopped seeing my mother with the eye of child, I saw the woman, who helped me give birth to myself.
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माँ !
माँ बनना एक अत्यधिक त्रासद व सुखद अनुभव है। यह सृष्टि की आवश्यकता और उपलब्धि भी है। यह प्रकृति प्रदत्त है और इसीलिए उसमें प्रकृति का अंधापन भी है। इसी कारण मातृत्व सदा से संकटपूर्ण रहा है। पहले वह स्वयं के लिए असुरक्षित था, अब वह संसार के लिए अनियंत्रित हो गया है। माँ बनना अच्छा है, पर माँ बनते चले जाना ? अब तो संसार की पुकार है- तुम एक की माँ बनना या फिर सबकी माँ बनने का हृदय रखना, किन्तु कभी कइयों की माँ बनने का स्वप्न न देखना।
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माँ !
आडम्बर और विडम्बना में जीना संभवतः स्त्री की नियति है। ऑस्कर वाइल्ड ने कहा है- ‘‘सभी महिलाएँ अपनी माँ की तरह होती हैं, यह उनकी त्रासदी है और कोई भी पुरुष उसकी तरह नहीं होता, यह पुरुष की त्रासदी है।“(1) ‘हम जिस समाज में जीते हैं, उसमें स्त्री जन्मती नहीं, बल्कि वह स्त्री बना दी जाती है।’(2) निश्चय ही पुरुष प्रभुत्ववादी समाज में तुम्हें उसके अनुरूप ढाल दिया जाता है। परन्तु युग बदल रहा है। तुम कब परम्परा की वाहक होना छोड़कर अपने व्यक्तित्व की उद्धारक होना स्वीकार करोगी ? पुरुष के रंग में रँगो, यह तो अनुचित नहीं, किन्तु पुरुष के ढंग से चलो, यह कहाँ तक उचित है?
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(1)   Oscar Wilde- All women become like their mothers, that is their tragedy. No man, does that is his. - A woman of no importance
 (2)   Simone de Beauvoir - One is not born woman, one becomes one. - The Second sex
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माँ !

पुत्र कुपुत्र भी हो, तो माता कुमाता नहीं होती।(1) किन्तु पुत्रवधू सत्पुत्रवधू भी हो, तो माता कभी स्वयं को विमाता से अधिक नहीं सिद्ध कर पाती। तुम स्वयं लक्ष्मी हो, अतः यदि तुम्हारे ही घर में कोई नई गृहलक्ष्मी आए, तो उसे तुम धनलक्ष्मी लाए बिना कैसे प्रवेश दे दोगी। यही कारण है कि प्रत्येक घर में सदा सास की जिह्वा पर सरस्वती और भुजाओं में दुर्गा विराजती रहती है। तभी तो परिहास में कहते हैं- सीता भी तुम्हारे ही भय से राम के साथ वन चली गई थीं, क्योंकि एक सास के साथ जब निर्वाह इतना कठिन है, तो कोई तीन सासों के साथ अकेले कैसे रह सकता है। काश कि कोई सास यह याद रख पाती कि वह भी कभी बहू थी और बहू भी कभी किसी की पुत्री थी।
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(1)     शंकराचार्य - कुपुत्रो जायेत् क्वचिदपि, माता कुमाता न भवति।
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माँ !
नवजात शिशु सदा से तुझे पुकारते रहे हैं।(1) किन्तु आज असंख्य अजन्मे शिशुओं की सदाएँ सुनाई पड़ रही हैं। इन अजात भ्रूणों की शत्रु क्या उनकी माँ स्वयं बनेगी ? स्त्री का व्यक्तित्व विखंडित तो था, किन्तु उसका पत्नीत्व और मातृत्व कभी इतना विभक्त नहीं हुआ था। युगों से आत्महत्या को अभिशप्त स्त्री ने अब अपने भीतर पल रहे स्त्रीत्व की भी हत्या करना सीख लिया है। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि मानवता ने प्रेम दिवस और बाल दिवस के साथ ही ‘स्तनपान दिवस‘ भी घोषित कर दिये हैं, ताकि कोई बच्चा माँ के जीवित रहते न मरे और न ही कभी बच्चों के होते माँ का मातृत्व मरे।
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(1)  Sophocles - Children are the anchors, that hold a mother to life.    
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माँ !
मेरे हृदय में चाहे जितने शल्य धँसे हों, मैं कभी उसके विरुद्ध नहीं रहा हूँ। विज्ञान ने जब मातृत्व न प्राप्त करने की शल्य चिकित्सा ढूँढी, थी, तब स्त्री को जीवन में पहली बार दैहिक स्वतंत्रता मिली थी। किन्तु इतिहास ने जब जीवित माँ की शल्य चिकित्सा कर पहली बार शिशु को जन्म देने का निर्णय दिया था, तब भी एक क्रांति हुई थी। जूलियस सीजर के इस निर्णय पर हम आज भी इसे “सीजेरियन ऑपरेशन कहते हैं क्योंकि उसने भी जन्म ऐसे ही पाया था। शायद उसे पता था- स्त्री बहुधा मातृत्व पाकर ही तृप्त होती है, अन्यथा वह भी कभी क्लियोपेट्रा बनने को अभिशप्त हो जाती है।
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माँ !
स्त्री निर्दोष है, क्योंकि उसके हर कृत्य के लिए पुरुष और उसके द्वारा निर्मित समाज दोषी है। परन्तु कौन तुम्हें स्त्रीमुक्ति विरोधी संतों की भक्ति को प्रेरित करता है? कौन तुम्हें पुत्रजन्म पर थालियाँ पीटने को उत्साहित करता है और कन्या शिशु की भ्रूणहत्या के लिए विवश करता है? कौन तुम्हें अपने ही पुत्र की तुलना में अपनी पुत्री को उसके अधिकारों से वंचित रखने और असमान व्यवहार करने की शिक्षा देता है? क्यों हर दहेज-हत्या में सास की भागीदारी होती है और कोई स्टोव-सिलेंडर सास पर नहीं फटता? माँ तुम्हारे पास उत्तर तो होंगे, पर तुम क्या स्वयं अंतर्मन में उत्तरदायित्व से बच पाओगी
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माँ !
इस संसार में मेरा तुमसे दूध और खून का संबंध है और इस कारण मैं कभी मातृ-ऋण से उऋण नहीं हो सकता। कहते हैं ईश्वर संसार को बना तो सकता था, किन्तु आगे उसे सँभाल नहीं सकता था इसलिए उसने माँ बनाई।(1) इसीलिए तो हम माँ और मातृभूमि दोनों को स्वर्ग से श्रेष्ठतर मानते हैं।(2) पर हम कब तक तेरे आँचल तले तोतली मातृभाषा में बात करते रहेंगे। आ, आज हम वसुधा के विशाल अंचल में चलें, क्योंकि वह तो तुम्हारी भी माँ है। संभवतः वही हमें ‘वसुधैव कुटुम्बकम्‘ कहे बिना भी मातृत्व को ममत्व(3) से पृथक् करना सिखलाएगी।
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(1)  Quote- God cannot be everywhere and so he made mothers. - Anonymous
(2) वाल्मीकि - जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।।
(3) ममत्व - मेरेपन की भावना, अहंकार का संबंधगत रूप। - शब्दकोश

माँ !
मैं माँ होने के मायने नहीं सिखलाता, क्योंकि मैं तो उस योग्य ही नहीं। मैं तो बस माँ को ‘बड़ी माँ’ बनते देखना चाह रहा हूँ। कल जब तुम बच्ची थी, तुम्हारे हाथ में अपनी गुड़िया थी। फिर जब तुम बड़ी हुई, तो तुम्हारी गोद में अपने बच्चे थे।(1) मैं चाहता हूं कि अपनों के लिए तुममें जो अपनापन था, वह परायों के लिए भी हो। तुम घर से ही नहीं, अपने आँगन की चहारदीवारी से भी बाहर निकलो; ताकि तुम देख सको कि तुम माँ होने से पहले एक स्त्री हो, एक स्त्री होने से पहले एक व्यक्ति हो और एक व्यक्ति होने से पहले एक मानव हो। दुनिया भी यह जान सके कि मानवता आदमियत से ज्यादा हव्वाइयत(2) में होती है।
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(1) Quote- There is only one pretty child in the world and every mother has it.- Chinese Proverb
(2) हव्वाइयत- पहली स्त्री हव्वा की परंपरा, जैसे- आदमियत पहले पुरुष आदम की परंपरा है।
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माँ !
बच्चा न केवल साढ़े नौ माह तक पेट में पलता है और न ही केवल साल दो साल तक गोद में खेलता है। भीतर की नाल कट भी जाए और ऊपर का स्तनपान छूट भी जाए, तब भी वह उसके दिल में ही जीता जागता रहता है।(1) उसकी पुलकित पलकों की छाया में बालक के सपने तब तक पलते और जीते रहेंगे जब तक वह जीती है और उसका बालक भी तब तक बालक ही रहेगा, भले ही वह माँ की आँखों के सामने ही वृद्ध होकर काल-कवलित हो जाए। पर माँ, कब तक तू अपनों, बस अपनों के लिए जीएगी; कभी तो तू परायों के लिए न सही, अपने लिए तो जी।
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(1) H. W. Beecher - The babe first feeds upon the mother’s bosom, but he is always on her heart.
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माँ !
कहते है बेटे बँट भी जाएँ, तो माँ नहीं बँटती। कहावतें भी शायद तुम्हारी तरह ही मीठी और भोली होती है, अन्यथा किसे नहीं पता कि इस संसार में मातृत्व भी कई स्तरों पर विभाजित और विखंडित होता है। क्या विश्व कभी अविवाहित मातृत्व को भी वही गौरव दे पाया है, जो विवाहित मातृत्व को मिलता रहा है? और क्या तुमने कभी पुत्री होने के मातृत्व को भी उसी स्वाभिमान के साथ अपनाया है, जितनी श्लाघा से पुत्र होने के मातृत्व को जतलाया था। मैं तो उस विश्व में जन्म लेना चाहता हूँ माँ, जहाँ मातृत्व पति की वैधानिकता अथवा संतान की लैंगिकता से न तो सम्मानित होता हो और न ही अपमानित।
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माँ !
तुमने जब पुरुष को कृषि की कला सिखलाई थी, तो यह कैसे सोच लिया कि वह शिकार के कौशल भूल जाएगा। स्त्री जब हिंसा की मृगमरीचिका में पड़ती भी है, तो अंततः अशोक की छाया में शोकसंतप्त रहकर अग्निप्रवेश की बाट जोहती है, किन्तु पुरुष जब अशोक बनकर शांति का उपदेशक भी बनता है, तो मृग-मयूर उसके भोजन बने रहते हैं। तुम कभी स्वेच्छा से, तो कभी अनिच्छा से यूँ ही भोग्या बनती रहोगी और यों ही भोगती रहोगी, क्योंकि तुम्हें कोमल शय्या चाहिए और उसे कोमल मांस। काश, जिस तरह तुम अपनी कठोर नियति सह पाती हो, उसी तरह मेरे कठोर वचन भी सह पाती और उसे संसार को सुना पाती।
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माँ !
मैंने तुम्हारी बाँहों के पालने में सोते हुए सपने देखे हैं(1) और पाँवों के हिंडोले पर झूलते हुए दुनिया देखी है।(2) जब तुम मेरी बाँहों में मनके और गले में चाँद-सूरज जडे गंडे-ताबीज डालती थी, तो मुझे यह कहाँ पता था कि तुम्हारा जीवन भी ऐसे ही सूत्रों से बँधा है। सबसे पहले तुमने बहन बनकर रक्षा-सूत्र बाँधना सीखा और फिर पत्नी बनकर मंगल-सूत्र पहनना, अब मेरी रक्षा व मंगलकामना के लिए इतने सूत्र जोड़ रही हो। देखो ये मन के मनके होते ही इसलिए हैं कि इन्हें भीतर से पिरोकर ऊपर से बाँध दिया जाए। अगर कहीं तू भी इससे बँध और बिंध गई, तो कभी चिता पर और कभी चूल्हे में यूँ ही जलती रहेगी; मोम बनकर यूँ ही गलती और पिघलती रहेगी।
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(1) Victor Hugo - A mother’s arm are made of tenderness and children sleep soundly in them.
       
(2) J. R. Lowell - The best academy, a mother’s knee.      

माँ !
यह पुरुष संसार सदा से तुम्हें कामिनी के रूप में दुर्भावनापूर्ण, पत्नी के रूप में संभावनापूर्ण तथा माता के रूप में भावनापूर्ण दृष्टि से देखता रहा है, परंतु मेरी ही दृष्टि में तुम न जाने क्यों अपूर्ण और दुःखपूर्ण दृष्टिगोचर होती रही हो। वस्तुतः संसार तो सुंदर और सुघड़ स्त्री चाहता है, सफल और सुदृढ़ स्त्री नहीं। इसलिए जब कोई कहे कि हर सफल पुरुष के पीछे एक स्त्री का हाथ होता है, तो इस मिथक से खुश मत होना; बल्कि उससे यह यथार्थ कहना कि असंख्य असफल स्त्रियाँ केवल इसलिए असफल हैं, क्योंकि असंख्य पुरुष उसके आगे हाथ उठाकर और उसके पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। पर तुम शायद इस प्रवंचना की मधुर तृप्ति से मुक्त होने का साहस नहीं कर पाओगी, अन्यथा तुम आज वहाँ होने से वंचित नहीं होती, जहाँ तुम मेरे होने के सपने देखती हो।
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माँ !
तुम पतिव्रता और पुत्रवती स्त्री हो और सदियों से माँ बनने के लिए पति व पुत्र अपरिहार्य शर्त भी रहे हैं। एक कारण है तो दूसरा परिणाम, पर मातृत्व की जैविक अनिवार्यताएँ विज्ञान के आघात-संघात में टूटी सी जा रही हैं। स्त्री को गर्भधारण करने के लिए अब न तो पति आवश्यक है और न ही यह आवश्यक है कि गर्भ में पल रहा पुत्र उसका अपना ही हो या अपना पुत्र उसके ही गर्भ में पले। दूध के रिश्ते पहले भी धाय माताओं के हवाले सुपुर्द होते रहें है, मगर खून के रिश्ते तो कभी इस तरह न टूटे-न छूटे, न कटे-न बँटे। मानता हूँ, टेस्ट-टयूब हो या एंक्यूबेटर, अभी ये सभी बच्चे को गर्भमुक्त नहीं कर पाए हैं, परन्तु शाश्वत विशेष पुरुषत्व ही जब निरर्थक हो चुका, तो मातृत्व का यह अंतिम अवशेष भी कब तक निःशेष होने से बचा रह पाएगा।

मकर संक्रांति


मकर संक्रांति
सूर्य के उत्तरायण होने और मानव के दाक्षिण्य का पर्व

            मकर संक्रांति का पर्व है। सांस्कृतिक दृष्टि से यह भारत का सर्वाधिक व्यापक लोकप्रियता वाला पर्व हैज्योतिषीय दृष्टि से यह सूर्य के बारह अध्यायों वाले राशि-ग्रंथ का दशम ग्रंथ हैधार्मिक दृष्टि से यह स्नान-दान, परिमार्जन व पुण्यार्जन का पर्व हैसामाजिक-व्यावहारिक रूप से यह नई फसल का उत्सव मनाने का पर्व है। 

            स्पष्ट है कि हिंदू परंपरा के अन्यान्य पर्वों की तरह मकर संक्रांति के भी चार मुख्य आयाम हैं- पहला, धर्म का, जहाँ यह स्नान-दान का पर्व हैदूसरा, संस्कृति का, जहाँ यह भोजन व नृत्य का उल्लास हैतीसरा, खगोल व ज्योतिष का, जहाँ यह उत्तरायण, माघी व मकर संक्रांति नामों की सार्थकता पाता हैचौथा, व्यवहार व विज्ञान का, जहाँ यह नई फसल और नए हौसले के पर्व के रूप में पहचान स्थापित करता है। 

            प्रारंभ संस्कृति से करते हैं। पर्वधर्मा संस्कृति में अगणित व्रत-पर्व हैंपर जहाँ तक उत्तर-मध्य हैचार सबसे मुखर हैं- होली, दीपावली, रक्षाबंधन और मकर संक्रांति। इनमें संक्रांति जरा अनूठी हैक्योंकि यह अन्य तीनों से अलग जरा व्रत की सी भी तासीर लिए हैस्नान-दान के रूप में। संक्रांति "खान-पान" का त्यौहार है, किन्तु उससे पूर्व यह "स्नान-दान" का पर्व है। दीपावली रात के लिए है, होली दिन के लिएपरंतु मकर संक्रांति रात, प्रात और दिन तीनों के लिए है। एक दृष्टि से यह संस्कृति में एकमात्र प्रभाती पर्व हैव्रत तो प्रात: के बहुत हैं, उत्सव नहीं। पर्व भी ऐसा कि सर्वथा निर्मल व परार्थी मन का पर्व। "तेन त्यक्तेन भुंजीथा:" का उद्घोष करता हुआ। सूर्य के उत्तरायण होने के साथ मानव के दाक्षिण्य (उदारता या दान का भाव) का विधान इसकी अपनी विशेषता है.

            यह स्नान पर इतना बल देता पर्व है कि ऐसा लगता है, जैसे संस्कृति चाहती है कि जितने दिन सूर्य दक्षिणायन था, उत्तरायण के आगमन पर वह उसके तमिस्र को पूरी तरह से धुल कर निर्मल कर दे। स्नान एक दिन का हो सकता है, किंतु इसी अवसर पर माघ मेले और कुंभ मेले का भी आयोजन होता है। वहां एक माह तक परंपरावादी जन कल्पवास भी करते हैं और वह उस कल्पवास में अपने को संसार और सांसारिकता से दूर और भी आध्यात्मिक और भी परिष्कृत करने का यत्न करते हैं। तब मकर संक्रांति के बहाने जनसामान्य गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी एक मास के संन्यास का रस पा जाता था। 

            जिनको धनु-मकर की सौर संक्रांति की जटिलता जानने में रस नहीं, वे अलग तरह से भी संक्रांति मान सकते हैं, वह यह कि इस समय ऋतुचक्र में सूर्य शीतलहर के साथ शीत आधा पार कर वसंत की ओर बढ़ रहा होता है। शीत-वसंत की संक्रांति की चर्चा आगे ज्योतिष के खंड में करेंगे। परंतु यह कह सकते हैं कि संक्रांति रात्रि-दिवा की भी है, लोहड़ी की आग की गीत भरी रात से शुरू हो जाती है, अलसभोर में ही स्नान-दान करने जुट जाती है और फिर पूरे दिन नवान्न का व्यंजन बनाकर समापन करती है। 

            उत्सव भी ऐसा कि कुछ सजाया नहीं जाताबस खाया-खिलाया जाता है। कहीं दही-चूड़ा, कहीं लइया-ढुंढाकहीं पकौड़ी-बड़ी, तो कहीं खींच-खिचड़ा। कुछ विरोधाभास से उभर आते हैं- सरसों फूलने का मौसम है और तिल के लड्डू-पट्टी-गजक बन रहे हैं। रबी की फसल है और खरीफ के चूड़े-पोहे-लाई से व्यंजन बन रहे हैं। बस एक मौसम का गुड़ है, जो सबमें घुले जा रहा है, मिठास घोले जा रहा है। 

            संक्रांति बहुत सहज है, बहुत कीमत नहीं माँगती। कोई दीपावली के मेवे नहीं, बस मूँगफलियाँ काफी हैंकोई दीवार रंगने, फर्श पर रंगोलियाँ बनाने की जरूरत नहींन होली की गुझिया चाहिए, न दिवाली के लड्डूबस गर्म खिचड़ी चाहिए, मीठे में तिलकुट, गजक, दालपट्टी, ढुंढा होकोई साज सज्जा नहीं करनाबस आसमान में रंगीन तिलंगियाँ उड़ाने और उड़ा न सके तो निहारने का आनंद उठाना है। 

            हर त्यौहार किसी बहाने जिंदगी में जिंदादिली लौटाता हैकभी बचपन लौटाकर, कभी यौवन लेकर। मकर संक्रांति में यह अपेक्षाकृत अदृश्य हैपर कुछ तो प्रकट हो ही जाता है। लोहड़ी की रात तेज हुई लपटों के साथ यौवन जागता हैसंक्रांति की सुबह प्रौढ़पन स्नान-दान कर तृप्ति पाता हैफिर दुपहर से साँझ ढले बस बचपन चहकता हैलौटता हुआ, लूटता हुआ, पतंगी तिलंगी व्याज से। 

            मकर संक्रांति सांस्कृतिक दृष्टि से भारत का सर्वाधिक व्यापक और व्यापकता के कारण बहुत सीमा तक राष्ट्रीय सा हो चुका पर्व है, जो नाम और परंपरा में किंचित् के परिवर्तन के साथ अपने हर क्षेत्र में विद्यमान रहा है, पूरब से पश्चिम तक, उत्तर से दक्षिण तक। सब जगह अलग अलग नाम हो सकते हैं- 
-बिहार, उत्तर प्रदेश में खिचड़ी; मिथिलांचल में तिल संक्रांति; हरियाणा, हिमाचल में माघी; असम में भोगाली बिहू; कश्मीर में शिशुर सेंक्रात; -तमिलनाडु में ताइ पोंगल, उझवर तिरुनल; कर्नाटक में मकर संक्रमण, सुग्गी हब्बागुजरात, उत्तराखण्ड में उत्तरायण; पश्चिम बंगाल में पौष संक्रान्ति
            इन्हीं से मिलते जुलते नाम अन्य क्षेत्रों में भी हैं। दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में भी जहाँ कभी हिंदू संस्कृति बसती थी, बहुत परिवर्तन के बाद भी वहाँ संक्रांति मनाई जाती रही है। अधिकांश जगहों पर अपने क्षेत्रीय नामों के साथ मकर संक्रांति नाम भी चलता रहता है। जगह के साथ नाम ही नहीं, कुछ परंपरा भी बदल जाती है। पंजाब हरियाणा में लोहड़ी एक दिन पहले जल जाती हैदिन भी नहीं, वरन् रात मेंतिल मूँगफली के साथ में। बिहार में खिचड़ी दही चिउड़ा के साथ गोभी, प्याज की पकौड़ियाँ भी जुड़ जाती हैं। 

            पर्व वस्तुत: औपचारिकता के लिए नहीं होते, वे उल्लास के लिए होते हैं, इतने उल्लासमय कि किसी शुभकामना का औचित्य ही न हो, इतने मंगलमय कि किसी मंगलकामना की अपेक्षा ही न हो। मकर संक्रांति में न दीपावली की राम-राम है, न होली का श्याम गीत। पर उल्लास में कमी नहीं। मन कहता है कि पर्व हो ही ऐसा कि रोम-रोम पुलकित हो जाए, हर कोई "तन-मन-धन" से उत्सव मनाये। अब हर पर्व "तन-मन" का होता है, पर हर पर्व "तन-मन-धन" का नहीं होता, होली में "तन-मन" है, तो दीपावली में "मन-धन" है। पर संक्रांति "तन-मन-धन" का पर्व है, बिना राग के अतिरेक के। अनजाने में ही सही, पर संक्रांति है तो ऐसी ही-- पहले तन का स्नान, धर्म के साथ; फिर धन का दान, अन्न और व्यंजन के साथ ; फिर मन की उड़ान, पतंगों के साथ। 

            संक्रांति मूलतः तो नई फसल का त्यौहार हैजो व्यंजनों में सजता है; परंतु सूरज के बदलने के साथ नये साल के नये हौसले का भी त्यौहार हैजो पतंगों में दिखता है और उससे भी पहले शरद के निर्मल बहते जल में यह तन को निर्मल करने का भी त्यौहार हैजो तीर्थ स्नान में निखरता है। सच कहूँ तो जिन्हें भी निर्मलता में रस हैस्वयं का कुछ बाँटने में गौरव हैमकर संक्रांति उन्हीं के लिए खास है। 

            खगोल के जगत् में चलते हैं। सूर्य के धनु से मकर राशि में प्रवेश को उत्तरायण माना जाता है। इस राशि परिवर्तन के समय को ही मकर संक्रांति कहते हैं। हिंदू पर्व अधिकांशतः चांद्रमास के पर्व हैं, केवल कर्क व मकर संक्रांति ही इसके अपवाद हैं, जो सूरज को देख कर चलते हैं। यहाँ तक कि सूरज को अर्घ्य देने का बिहारी मूल का पर्व छठ भी चंद्रमा की तिथि को देख कर चलता है। चंद्रमा बहुत अनियत है, परंतु सूर्य बहुत निश्चित है, इसीलिए इनकी अंग्रेजी सौर कैलेंडर में भी 14 जनवरी की तिथि तय है। कभी जरा परिवर्तित होकर एक दिन पहले या बाद हो सकती है, क्योंकि वर्ष गणना में कुछ घड़ियाँ हर साल कम पड़ जाती हैं, अगले साल लीप ईयर बनाने के लिए। 

            दृश्य में सूर्य शासक हैंदर्शन में सूर्य शास्ता हैं। सूरज सदा से महान शासन का प्रतीक रहा हैपरंतु उससे अधिक महान अनुशासन का भी। सूर्य हुताशन है, हुतात्मा है, परंतु वह स्वयं अपनी आहुति भी हैअपनी समिधा भी है। बहुत ऊँचे और बड़े होने का मूल्य उसे स्वयं का जीवन होम करके चुकाना पड़ता है। संक्रांति सूर्य को हमारी शास्ता और ऊर्जा स्रोत मानकर ही नहींहुताशन मानकर भी पर्व मनाती हैतभी तो सूर्योदय से पहले स्नान कर उसका स्वागत करती है, "तेन त्यक्तेन भुंजीथा" के भाव से। 

            संक्रांति शब्द जरा भ्रमित सा करता है। वह कुछ द्वंद्व समास सा भाव लिए है, जैसे ऐसा कुछ है, जो अपने संक्रमण काल में है, कदम उठाया है, कहीं जाने का, पर जाते-जाते एक कदम पीछे रह गया है। परिवर्तन तो हो रहा है, अभी पूरा हुआ नहीं है। कुछ क्रांति सी होती, यदि यह परिवर्तन जरा आमूल होता, तीव्र होता। 

            खगोलीय व भूगोलीय रूप से पृथ्वी के सापेक्ष सूरज संक्रांति में है। वह राशि के सहारे अयन बदल रहा है। यह अयन क्या है? काल विभाजन में मास और वर्ष का अपना विभाजन है, मास चंद्रमा का विभाजन है, वर्ष सूर्य का। और जिस प्रकार चंद्रमा का मास कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में विभक्त है, वैसे ही सूरज का वर्ष भी दो भागों में विभक्त है- उत्तरायण और दक्षिणायन। दो पक्षों का एक मास है, दो अयनों का एक वर्ष है।
            पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा कर रही है। वह जरा तिरछी है, जहाँ से घूम रही है, वहाँ साढ़े तेइस डिग्री झुक कर चल रही है। शायद पिता सूर्य को नमन करती, या फिर स्त्र्युचित स्वभाव से किंचित वंकिम भंगिमा अपनाती। ऐसे में जब वह सूरज का एक चक्कर पूरा करती है, तो कभी सूर्य पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में अधिक दीप्त होता है, कभी दक्षिणी गोलार्ध में। मकर संक्रांति के पूर्व सूर्य पृथ्वी के सापेक्ष दक्षिणी गोलार्ध में अपनी दृष्टि अधिक रखता है, मकर संक्रांति के दिन सूर्य पृथ्वी के सापेक्ष उत्तरी गोलार्ध में प्रयाण करने लगता है। सूरज भला क्या प्रयाण करेगा, बस पृथ्वी ही परिक्रमा करते करते जरा उत्तराभिमुख हो जाती है। धरती की दिशा बदली, और सूर्य उत्तरायण हो गया। भगवान भुवन भास्कर का अपना उत्तर-दायित्व है। सबको समान नियम से आलोकित करना है। सूरज जितनी दूर तक धरती पर सीधा दीप्त हो सकता है, वह विषुवत रेखा के उत्तर में कर्क रेखा और दक्षिण में मकर रेखा तक जाता है। पर्व के लिए विषुवत रेखा की अपनी कोई राशि नहीं, वह बस संक्रमण की रेखा है, संक्रांति की। जिसके उत्तर गए कि मकर संक्रांति का प्रारंभ हो गया। संयोगवश इन्हीं दोनों रेखाओं की राशियों की संक्रांति पर्व है। दो ऋतुओं के प्रतिनिधि के रूप में, शीत और ग्रीष्म। कर्क संक्रांति ग्रीष्म का पर्व है, ठीक वैसे ही जैसे मकर संक्रांति शरद का पर्व है। बस अंतर यह है कि कर्क संक्रांति वैशाखी है, मकर संक्रांति माघी है। 

            यहाँ खगोल विज्ञान पर चलता ज्योतिष कहता है, सूरज राशि के सहारे अयन बदल रहा है। मकर राशि के सहारे। राशि क्या है? पृथ्वी सूर्य का चक्कर एक साल में लगाती है। अगर आकाश एक घडी है, तो ये राशियाँ उसके बारह घंटे। इस बारह खानों वाली घड़ी में कभी-न कभी कोई न कोई ग्रह आता है। कुंडली में इसे ही बारह खानों में दिखाते हैं। ग्रहों में चाँद और सूरज सबसे महत्त्वपूर्ण हैं। भारत में माना जाता है कि ग्रहों में चाँद सबसे निकट होने के कारण प्रभावी है, इसलिए यहाँ आदमी की वो राशि मानी जाती है, जिसमें चन्द्रमा स्थित हो। पश्चिम में माना जाता है कि ग्रहों में सूर्य सबसे विशाल और केंद्रीय तारा होने के कारण प्रभावी है, इसलिए यहाँ आदमी की वो राशि मानी जाती है, जिसमें सूर्य स्थित हो। इस तरह एक ही आदमी की दो-दो राशियाँ हो सकती हैं।
            सूर्य की गति चूंकि निर्धारित है, अतः सूर्य के अनुसार राशि बताते समय उसकी अवधि लिखी जाती है, जैसे (14 जनवरी से 13 फरवरी तक) जबकि चन्द्र के अनुसार राशि बताते समय कोई अक्षर लिखा जाता है, जैसे च, चा, चू, इत्यादि। ये अक्षर भी 27 नक्षत्रों के 4 चरणों के लिहाज़ से 108 हो जाते हैं। एक ग्रह किसी राशि में कब आता है, इसकी गणना भी दो तरह से की जाती है, जिन्हें क्रमशः "निरयण" और "सायन" कहा जाता है। भारत में "निरयण" और पश्चिम में "सायन" परंपरा अपनाई जाती है। "सायन" "निरयण" से लगभग तीन सप्ताह से एक माह तक आगे चलता है, जैसे भारत की "निरयण" परंपरा में मकर राशि में सूर्य 14 जनवरी को आता है, जबकि पश्चिम की "सायन" परंपरा में मकर राशि में सूर्य 22 दिसंबर से 19 जनवरी तक रहता है। यही सभी राशियों के साथ होता है।

            इस प्रकार किसी आदमी के एक साथ चार राशियाँ हो सकती हैं, जिनमे दो सूर्य की होंगी और दो चन्द्रमा की। ये कुल बारह राशियों का एक तिहाई है। अब अगर गौर करें, तो इन्हीं आधारों पर कह सकते हैं कि सूर्य की एक साथ सूर्य दो राशियाँ या संक्रांतियाँ भी दिख सकती हैं, "सायन" से अलग, "निरयण" से अलग। परंतु यहाँ ज्योतिष की नहीं, खगोल की बात है, एस्ट्रोलोजी नहीं, एस्ट्रोनोमी की। ज्योतिष कहता है- बारह राशियां हैं, जिनमें मकर, कुम्भ, मीन, मेष, वृषभ तथा मिथुन राशि में सूर्य के परिभ्रमण की स्थिति उत्तरायण की मानी जाती है। शेष कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु राशि में सूर्य के परिभ्रमण की स्थिति दक्षिणायन की मानी जाती है।
अब यदि बारह राशियाँ हैं, तो प्रति मास ही सूर्य बारह राशियों में एक से दूसरी में प्रवेश करता रहता है। ऐसे में सौरमान से हर माह एक संक्रांति है, क्योंकि प्रति मास सूर्य के एक राशि से दूसरी में प्रवेश कर रहा होता है। परंतु संस्कृति ने सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने की मकर संक्रांति को विशेष पावनता दे रखी है। कर्क संक्रांति भी लगभग उतना ही महत्वपूर्ण है, पर वह शायद संख्या व विस्तार बल में मकर से कम पड़ जाता है। 

            सूर्य हर माह किसी राशि की संक्रांति में हैं। यह संक्रांति पाश्चात्य कैलेंडर में मध्य में पड़ता है। ऐसा लगता है कि कभी सौर मास की गणना चौदह दिनों पूर्व या पश्चात् प्रारंभ करने की परंपरा रही होगी, जो विलुप्त हो गई। बारह राशियों से जुड़ कर ही बारह मास बने, द्वादश आदित्यों की कल्पना हुई। देवों के जुड़ने के साथ धर्म व अध्यात्म के रूपक आ जाते हैं। मकर राशि का स्वामी शनि है, इसलिए समय के साथ कथा रची गई कि मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। यह पुराणकारों द्वारा जनसामान्य को बात समझाने का अपना तरीका था। 
            ऐसी अन्य कहानियाँ धर्म व संस्कृति को आधार देने के लिए रची गईं। जैसे यह कि मकर संक्रान्ति के दिन ही मकर संक्रांति के दिन ही गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था। यह गंगास्नान की महत्ता को रेखांकित करने का सेतु बन गया। ऐसे ही एक अन्य कथा के अनुसार मकर संक्रांति के दिन ही गंगा भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में मिली थीं। लोक गंगास्नान करता ही था, कथा उसे सागर तक जोड़ जाती है, गंगासागर में माघस्नान का आमंत्रण सा देते हुए। 

            सूर्य के उत्तरायण होने के साथ जुड़ी कुछ अन्य बातें भी हैं। पृथ्वी जहां से झुकती है, पूर्वोत्तर का कोना ईशान कोण कहा जाता है और दक्षिण पश्चिम का कोना नैऋत्य कोण का। ईशान अर्थात् वहां जहां ईश हों, और नैऋत्य वह जहां ऋत को न मानने वाले हों। अर्थात कुछ आसुरी है वहाँ। पुरानी परंपरा मानती थी कि सूरज जब दक्षिणायन हो जाएंगे, वह देवों के लिए तमिस्र काल होगा, जब यह उत्तरायण होंगे तब देवों के लिए आलोकमय होगा। यह बात इतनी घर कर गई कि संस्कृति ने दक्षिणायन काल को मुक्ति में भी बाधक मान लिया। श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि जो योगी ज्योति, अग्नि, दिन, शुक्लपक्ष, उत्तरायण, के छह माह में देह त्यागते हैं, ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त होते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। इसके विपरीत धुंआ, रात्रि, कृष्ण पक्ष एवं दक्षिणायन के छह माहों में जो देह त्यागते हैं, वह चन्द्रमा की ज्योति को प्राप्त करके पुनः लौटते हैं अर्थात् उन्हें पुनः जन्म लेना पड़ता है।
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌ ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥
धूमो रात्रिस्तथा कृष्ण षण्मासा दक्षिणायनम्‌ ।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥
(गीता, अध्याय- 8, श्लोक- 24-25) 

            कृष्ण का निहितार्थ कुछ आध्यात्मिक आलोक से रहा होगा, किंतु रूपकों से ऐसा ध्वनित होता है, जैसे सूर्य के उत्तरायण होने पर पृथ्वी प्रकाशमय और सूर्य के दक्षिणायन होने पर पृथ्वी अंधकारमय होती है. उत्तरायण में मृत्यु पाने वाले तो ब्रह्ममय होकर मुक्ति पा जाएँगे, परंतु दक्षिणायन में मृत्यु पाने वाले तमिस्र में भटकते हुए फिर चाँद की सी कामना लिए लौट आएँगे। बात कृष्ण के कहे अनुसार या फिर उनके कहने से पहले ही इतनी घर कर गई थी कि महाभारत में पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने पर ही स्वेच्छा से शरीर का परित्याग किया था। "तमसो मा ज्योतिर्गमय" कहता मन भला तमस् माने जा चुके काल में "मृत्योर्मा अमृतं गमय" कैसे कहता।

            अब व्यवहार और विज्ञान की ओर लौटते हैं, इसमें भी विज्ञान से अधिक व्यवहार की ओर, क्योंकि विज्ञान की बात हर जगह संभव है, परंतु वह अक्सर कुछ खींचतान का रूप ले लेती है। मन कहता है, जिस समय ये बातें शुरू हुई हों, वे व्यवहार से अधिक आई होंगी, विज्ञान से कम। विज्ञान अंतर्निहित रहा हो सकता है।
            लगभग सभी मानेंगे कि मकर संक्रांति की महत्ता उसके नई फसल का पर्व बनने में है। नवधान्य आ चुके होते हैं, जिनके व्यंजनों की संक्षिप्त चर्चा हो चुकी। परंतु प्रश्न यह उठता है कि उसमें तिल और गुड़ की इतनी महत्ता क्यों है। यह इस समय उत्पादित हो चुके होते हैं, यह एक बात है, परंतु उन्हें विशेष महत्व दिया जाना दूसरी बात है। शीतकाल में वसा की आवश्यकता सभी को होती है। किसी कालखंड में जब मानव को वसा के अन्य स्रोत का ज्ञान नहीं रहा होगा, तब संभवतया तिल ही सबसे बड़ा स्रोत रहा होगा। तिल शब्द से ही तैल शब्द बना है, जो कालांतर में सभी प्रकार के तेलों का पर्याय बन गया। इस से इतना तो पता लगता है कि भारतीय परंपरा में जो तेल सबसे पहले आया होगा, वह तिल का ही रहा होगा। अलसी का बीज क्षुमा के रूप में ज्ञात हो चुका होगा, क्योंकि अलसी के रेशे से बने क्षौम वस्त्र प्रसिद्ध है, किंतु उसके तेल की विशेष प्रसिद्धि नहीं हो पाई। संभवत: इसी कारण तिल का भोग और तिल के दान दोनों की परंपरा का विशेष महत्व हुआ होगा। इसी प्रकार इक्षु या गन्ना हमारी शर्करा का सबसे प्रमुख स्रोत रहा है। शर्करा कार्बोहाइड्रेट का सबसे इंस्टैंट और सरल रूप है और इस प्रकार वह सीधे ऊर्जा में परिणत होने में समर्थ है। यह इक्षुरस किसी भी अन्य मधुरस से अधिक सरल सुलभ और महत्वपूर्ण रहा है। इस कारण गुड़ की चीजों को प्रधानता दी गई, ताकि शीतकाल में उनका उपयोग तन की सुरक्षा में बेहतर रूप में किया जा सके।
            मकर संक्रांति तब आती है, जब शरद ऋतु घनीभूत होकर शिशिर ऋतु में परिवर्तित हो जाती है और फिर आगे वसंत का मार्ग प्रशस्त कर रही होती है। दीपावली शरद का का आरंभ हैइसलिए उसमें संचय का भाव है। मकर संक्रांति शीत के समापन का संकेत हैइसलिए उसमें दान का भाव है। यहां उल्लेखनीय है कि शरद मूलतः ऋतु है, किंतु जब वैदिक जन कहते हैं, "जीवेम शरद: शतम्" तब यहाँ शरद् वर्ष का पर्याय मान ली गई है। कई तर्क हो सकते हैं- संभव है, शरद् को वर्ष का सबसे प्रिय या पवित्र माना गया हो, या फिर सबसे कठिन। यह प्रतीकात्मकता या तो मधुरतम ऋतु के रूप में रही होगी या फिर कठिनतम ऋतु के रूप में और तर्कत: कठिनतम ऋतु का अर्थ ही अधिक उपयुक्त है। वैदिक ऋषि वर्ष के लिए संवत्सर का प्रयोग करते हैं, वर्ष का नहीं, क्योंकि वर्ष शब्द मूलत: वर्षा का भाव लिए है और इसकी साल के लिए मुख्य गणना तब प्रारंभ हुई होगी, जब वर्षा की महत्ता बढ़ी होगी अर्थात् कृषि प्रमुख आजीविका हुई होगी। वस्तुत: शरद शब्द शर-द से बना है, क्योंकि इस मौसम में सरकण्डे तैयार होते थे। इनसे ही धनुष के तीर (शर) बनते थे। शरद तक सरकण्डे पूरे श्वेत पुष्पों से भर जाते हैं। तुलसी कहते हैं- "वर्षा विगत शरद ऋतु आई...फूले कास सकल महि छाई।" हजारी प्रसाद द्विवेदी ने मकर संक्रांति तक मृत्यु की प्रतीक्षा करने वाले भीष्म के शर शय्या पर होने की कहानी में उनके बाणों की बजाय ऐसे ही सरकंडों की चटाई पर होने का भी तर्क दिया है। 

            यहाँ यह भी हो सकता है कि शरद को वर्ष का आरंभ या अंत मानने से वर्ष का पर्याय मान लिया गया हो। वेदों में वसन्त ऋतु को संवत्सर का मुख कहा गया है। इसलिए वसन्त ऋतु में वर्षारम्भ होना चाहिए। हमारे व्रत, पर्वोत्सव का निर्धारण चन्द्रमान के अनुसार ही होता है और 'चैत्र' मास से ही चन्द्र मासों की गणना की जाती है, अत: 'चैत्र मास' से ही वर्षारम्भ माना जाता है। इस प्रकार चैत्र से वर्ष का आरंभ होने से चैत्र-वैशाख में वसंत ऋतु मानी गई। वैदिक मान्यता में वसंत मधुमास है। किंतु ऋतुराज वसंत में ही ऋतुओं का सर्वाधिक व्यतिक्रम दिखता है, पौराणिक परंपरा अनुसार वसंत पंचमी माघ की शुक्ल पंचमी को मनाया जाता है और वैदिक परंपरा अनुसार वसंत को पड़ना चैत्र में चाहिए। रोचक है कि वसंत पंचमी मनाई तो माघ में जाती है और ऋतुओं की गणना में चैत्र में दिखाई जाती है। कहीं तो चूक हुई है, माघ के साथ।
            यहाँ ध्यातव्य है कि वैदिक काल में मास के नाम आज से बहुत अलग हैं। यजुर्वेद के अनुसार 12 मासों के नाम निम्न हैं- मधु, माधव, शुक्र, शुचि, नमस्‌, नमस्य, इष, ऊर्ज, सहस्, सहस्र, तपस्‌ तथा तपस्य। बाद में यही पूर्णिमा में चंद्रमा के नक्षत्र के आधार पर चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ तथा फाल्गुन हो गए।

            मकर संक्रांति शिशिर ऋतु में आती है, पर उसके वासंती होने के भी तर्क हैं। पहला यह कि वैदिक काल में जिस मधुमास से वर्ष आरंभ हो रहा है, उसे कालांतर का चैत्र मान लेना कोई भूल रही हो। दक्षिण भारतीय विद्वान टी वी शिवरमण का मानना है कि वैदिक व उत्तरवैदिक मासों का क्रम मिलाने का आधार विष्णुधर्मोत्तरपुराण है, परंतु यह वैदिक क्रम में कम से कम एक मास के अंतराल की त्रुटि वाला है। ऐसे में एक तर्क मधुमास के माघमास होने का बन सकता है, परंतु इसे भी अतिरिक्त पुष्टि चाहिए। 

            दो अन्य तर्क भी जुड़ सकते हैं। संभव है, वैदिक जन जिस जगह पर मुख्यतया रहते हों, वहाँ सचमुच आज के माघ तक वसंत आ जाता रहा हो। तबकी जलवायु भी कुछ अलग रही होगी। वैसे समस्त जगहों के लिए ऋतुक्रम एक नहीं हो सकता, उनके मास व अवधि एक नहीं हो सकती, कहीं शीतकाल लंबा होगा, तो कहीं वृष्टिकाल और कहीं ग्रीष्मकाल। पूरा जम्बूद्वीप तो दूर, अकेला भारत ही इतना वृहत् है कि परंपरागत ऋतुक्रम को सटीक नहीं किया जा सकता। उल्लेखनीय है कि चरक व सुश्रुत ने ऋतुओं की जो गणना की है, उनमें शिशिर का नाम नहीं आता। उन्होंने वर्षा के चातुर्मास के लिए आषाढ़ व श्रावण में प्रावृट् नाम से अतिरिक्त वर्षा ऋतु का उल्लेख किया है। वहाँ चैत्र के साथ वैशाख को नहीं, फाल्गुन को वसंत माना गया है। वहाँ ऋतुसंधि की कल्पना है, जो वैज्ञानिक ही है। यह बात केवल ऋतुओं के विरोधाभास को संकेतित करने के लिए रखी गई है। निष्पत्ति केवल यह है कि एक संभावना है कि किसी कालखंड में मकर संक्रांति किसी संवत्सर का आरंभ रही होगी, पर वह वैसे ही विलुप्त हो गई, जैसे दीपावली के प्रारंभ होने वाले कुछ संवत्सर विलुप्त हो गए। 

            संस्कृति, धर्म, विज्ञान व ज्योतिष के बाद पुनः संस्कृति की ओर लौटते हैं, क्योंकि वही तो प्रमुख है, सबका समाहार। मकर संक्रांति में एक और समाहार है, वह है पतंगों का। पतंगें अपने मूल में भारतीय नहीं हैं, अत: वे इस पर्व में बाद में शामिल हुई होंगी। समय के साथ संक्रांति पतंगों का पर्व बनता गया है। वह दान का कम, उड़ान का पर्व अधिक हुआ है। पहले लोग पतंगें उड़ाने और लूटने में गिरते मरते थे, अब राह चलते मरने लगे हैं। जिस देश में पतंगें खोजी गईं, उसी देश के धागे ने पतंगों को कातिल बना दिया। पतंगें, जो हवा के साथ भी उड़ती हैं और हवा के खिलाफ़ भी उड़ती हैं, जो धागे से बँधना भी जानती हैं और बँध कर उड़ना भी जानती हैं, जो अनजानों से लड़ना भी जानती है और अनजाने पेंच लड़ाना भी जानती हैं, जिनमें आसमाँ की कशिश भी है और आसमाँ का बादल बनने की कोशिश भी है, अब परिंदों से उनका आसमान ही नहीं, उनकी जिंदगी भी छीनने लगे हैं। जो हमरे मन की पंख बनकर आकाश में उड़ती हैं, वही आकाश में पंखवालों को घायल कर रही हैं। ये पतंगें मन के परवाने की तरह बन जाती हैं, वे उड़ती हैं, लहराती हैं, डगमगाती हैं, तिरती और मँडराती हैं- किसी परवाने की तरह, किसी कश्ती की तरह। मन कल्पना करता है कि एक तरह से पतंग और धागा, हृदय और मस्तिष्क की तरह हैं। भावनाएँ विचारों के धागे में बँधकर उड़ान भरती हैं और वह कल्पना, जो विचारों के सूत्र में ही उड़ान पाती है, पुन: विचारों से ही नियंत्रित हो जाती है। भावना की पतंग का निर्बंध होना, अपने ही सूत्र का कट जाना है। पर्व हमें जोड़ते हैं, हमें हमारी धरती से भी, आकाश से भी। शरद का आकाश बहुत निरभ्र होता है, दुनिया में मौसम न होते, तो शायद पता ही नहीं चलता कि सबके लिए धरती ही नहीं, आसमाँ भी अलग ही है। संसार संस्कृति से अधिक सफलता का हो चुका है। सफलता भी घर बनाती है, पर यह बाद में पता लगता है, हमें खुली छत नहीं, बंद बेसमेंट मिली है। बाजार की दौड़ में धरती के मेले खो से गये हैं। सोचता हूँ, मकर संक्रांति के नवधान्य के बहाने क्या हम अपनी थोड़ी सी धरती और उसकी पतंगों के बहाने अपना छोटा सा आकाश पा सकेंगे।

रक्तदान : प्रवाह धड़कन का


रक्त बहता है,
रगों में, धमनियों में,
दिल की धड़कनों से होकर,
फेफड़ों की हवा और ऊर्जा लेकर.

और
जब तक लहू दौड़ता है,
जिंदगी चलती है
और
कभी जरा बहा कि
मौत से फासला नहीं रह जाता.

विज्ञान कहता है,
खून एक सौ बीस दिन में नया हो जाता है.
ये जो चालीस पचास लाख लाल रंग के कण हैं,
रोज मरते हैं, नये बनते हैं
और
अगर खून दिया जाए,
तो उनके नये होने की दर जरा तेज हो जाती है।

और
फलसफा कहता है कि
रक्तदान महादान होता है,
बस इसलिए नहीं कि
अगर किसी मरते हुए को खून दे दिया जाए,
तो वह प्राणदान पा जाता है,
वरन् इसलिए भी कि
यही वह दान है,
जो हमसे भर नहीं आता,
हममें से होकर आता है।
हमारा अर्जन बनकर नहीं जाता,
हमारा अंश बन कर जाता है।

ख़लील ज़ीब्रान की एक विश्वप्रसिद्ध कृति है-
प्रॉफेट.
उसमें उन्होने दान के संबंध में कहा है
You give but little when you give of your possessions.
It is when you give of yourself that you truly give.

खून लाल है क्योंकि इसमे लोहा है,
इसीलिए इसे लहू कहा गया.
पर यह कभी पिघला सोना बन जाता है,
तब जबकि यह किसी की जिंदगी की कीमत बन जाता है.

कई बार वह वो दे जाता है,
जो माँ के आँसू नहीं दे पाते,
जो चाहने वालों की दुआएँ नहीं दे पातीं.

चिकित्सा विज्ञान ने दान की सीमाएँ बढ़ा दी हैं,
अब हम अंगदान कर सकते हैं, देह दान कर सकते हैं.
उसके आगे तो यह बहुत छोटा दान है,
पर मर रहे इंसान के लिए तो यह प्राणदान है,
उसके लिए तो हमीं दधीचि हैं.

विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है,
हड्डी की जगह मेटल इम्प्लंटस गये हैं,
हृदय भी कृत्रिम होने की ओर है और कृत्रिम मशीनों से चल रहा है,
किडनी भी खराब हो तो डायलीसिस की मशीनें संभाल लेती हैं,
पर खून का अब भी कोई सार्थक विकल्प नहीं मिला पाया है,
इसलिए भी रक्तदान महादान बना रहेगा,

कहते हैं,
लम्हे अक्सर सदियाँ तय कर देते हैं,
खून के लिए दिए लम्हे तो जाने कितनों की ज़िंदगियाँ तय कर देते हैं.
इस बहाने अपने कुछ पल में हम किसी को जिंदगी के कई साल दे सकते हैं.
और फिर अस्तित्व की एक खूबसूरत शृंखला बना लेते हैं,
जो हमारे बाद भी प्रवाह्मान रहता है-
जिंदगी के साथ भी, जिंदगी के बाद भी.

खून की फितरत में है, दौड़ना, गुजरना और
जब वह हमारी रगों से किसी और की रगों में दौड़ता है
तब सबसे चटख और शोख होता है, तब उसमें जिंदगी दौड़ती है,
उस हृदय की करुणा लिए, जिससे वह पल प्रतिपल गुजर कर शुद्ध होता है.

कहते हैं कि
दो तो ऐसे कि
बाएँ हाथ को भी पता ना चले कि दाएँ ने दिया क्या है.
दान बता कर दिया तो आधा रहा,
जता कर दिया तो चौथाई हो गया.
आपको पता नहीं होगा की ये खून किसकी जिंदगी में एक लौ
लेकर गया है.
यह ज्ञात से
अज्ञात से तक जाता है,
इसलिए यह महादान भी है और महान दर्शन भी.

हम किसी को खून दें, वह किसी को जिंदगी देगा.
हमारी जिंदगी का एक क़तरा किसी की पूरी जिंदगी बन जाता है.
यह हमारा श्रेष्ठ देय है,
क्योंकि देने वाले के लिए बेमोल है, पाने वाले के लिए अनमोल.

देनेवाले को हम दानवीर मानें मानें,
पानेवाले के लिए तो वह महानायक होता ही है,
कुछ कुछ रब सा,
अदृश्य भी, जीवन देने वाला भी.
फिर देनेवाला जाने किन अनजानी दुआओं और कृतज्ञताओं का हिस्सा बन जाता है,
उसे खुद पता नहीं होता.

जिंदगी मे अच्छे काम करने के मौके कम मिलते हैं,
और जब मिलते हैं हम अक्सर चूक जाते हैं.



तो अवसर निकालें,
इस महादान के लिए,
निकलें हम,
किसी को जिंदगी देने के लिए.

ग़ालिब का एक शेर है-
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल,
जो आँखों से ही टपका, तो लहू क्या है.

 कुछ बदल कर हम यूँ कह सकते हैं-
जो रगों से रगों तक ही ना पहुँचा तो लहू क्या है,

रक्तदान एक सुचक्र है,
कौन जाने आज हम किसी को दे रहे हों,
कल कोई हमें दे रहा हो.
जीवन के कुछ महानियम हैं,
दी हुई चीज़ें अक्सर लौट आती हैं,
किसी और रूप में,
बस हम पहचान नहीं पाते.