शुक्रवार, 3 मार्च 2017

साहित्य और दर्शन

"साहित्य और दर्शन"

साहित्य और दर्शन! मानव संस्कृति चिन्तन और परिकल्पना की दो पुरातनतम विधाएँ। एक में हृदय पक्ष प्रबल है, दूसरे में मनस्तत्त्व का संबल है। भावना बनाम तर्कबुद्धि!

दोनों में ऐक्य भी है और संघर्ष भी। साहित्य में जीवन के यथार्थ का चित्रण है और आदर्श की तलाश है, दर्शन में जीवन के यथार्थ से जीवन के परे के आदर्श तक पहुँचने का प्रयास है।

दोनों के मध्य इस सैद्धान्तिक अन्तर में भी किसी दीवार का-सा अन्तराल नहीं है, बल्कि एक धूमिल सी रेखा या झीने से पर्दे का सा हाल है। किन्तु व्यवहार ? वह कह सकते हैं कि साहित्य का अपना दर्शन है और दर्शन का अपना साहित्य है। लेकिन साहित्य के किन शिखर ग्रन्थों का अध्ययन दर्शन में किया जाता है या फिर दर्शन की किन पठनीय पुस्तकों का सजग अवलोकन साहित्य प्रेमियों द्वारा किया गया होगा?

समय ने इस भेद को गहरा किया है, ऐसा प्रतीत होता है, क्योंकि तब वेद, रामायण व महाभारत से दर्शन भी निकलता था और साहित्य भी छलकता था। तब साहित्य समाज का दर्पण बाद में होता था, वह समाज का दर्शन पहले होता था। वह समष्टि का निदर्शक भी होता और व्यष्टि का निर्देशक भी।

स्थिति बदल गई। दर्पण से मोह हो गया, तो दर्शन भी खो सा गया। ऐसा नहीं था कि साहित्यकार मार्क्सवादी, फ्रायडवादी या अस्तित्ववादी धारा में रचनाएँ न रचते, लेकिन वे शायद ही मार्क्स, फ्रायड या सार्त्र को पढ़ते और जब पढ़ लेते, तो शायद ही साहित्यकार बने रहते। वे गोर्की, काफ्का, प्रेमचंद को पढ़ते, प्रशंसा करते, किन्तु स्वयं को गोर्कीवादी, काफ्कावादी या प्रेमचंदवादी न कहते।

फिर भी साहित्य में परस्पर प्रशंसा का भाव प्रबल है, जबकि दर्शन में परस्पर आलोचना का। दर्शन तर्क का जगत् है, अतः हर नए दर्शन के उद्भव में अपने पुरातन दर्शन के प्रति असंतोष प्रमुख कारण होता है।

आलोचना स्वयं में कोई आदर्श नहीं। कहते हैं, जो प्रतिभा सृजन की प्रवृत्ति खो देती है, वह आलोचक बन जाती है। पर दर्शन में तो हर सृजन ही आलोचना की नींव पर खड़ी होती है। वैसे आलोचना और आदर्श दोनों का अर्थ एक है- आलोचना है, लोचन के आगे, आदर्श है, दृष्टि के आगे।

आदर्श बनाम यथार्थ - साहित्य व दर्शन इन्हें अपने-अपने तरीके से देखते और गढ़ते रहे हैं। वैसे तो साहित्यकार और दार्शनिक दोनों यथार्थ से दुःखी रहे हैं और शब्दों-अवधारणाओं के बूते परिकल्पनाएँ करते रहे हैं। किन्तु दोनों में अलग-अलग तरह से जीवन का वृत्तान्त होता। साहित्य में वह दृष्टान्तपरक होता, तो दर्शन में वह सिद्धान्तपरक। साहित्य में भावनाओं की रागात्मकता थी, इसलिए वह कथाओं में बहता, कविताओं में छलकता, नाट्यविधाओं में विचरता। दर्शन अपनी गहनता में गद्यात्मक होता जाता और कई बार तो संक्षिप्त होकर सूत्रात्मक हो जाता।

खैर, गद्य-पद्य तो अभिव्यक्ति की विधाएँ हैं, जो किसी में भी प्रयुक्त हो सकती हैं। दर्शन भी ‘गीता‘ की गेयता में प्रवाहित हो सकता है और साहित्य भी ‘चिन्तामणि‘ के चिन्तन में निबद्ध हो सकता है। अन्तर केवल प्रधानता का है।

‘‘सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम्‘‘ यह ग्रीक दार्शनिक प्लेटो के सर्वोच्च शुभ की आदर्श परिकल्पना का संस्कृतानुवाद है। शिवत्व अर्थात् कल्याण का दावा दोनों का है, किन्तु साहित्य का बल ‘सुन्दरम्‘ पर है, दर्शन का ‘सत्यम्‘ पर। ऐसा नहीं है कि साहित्य में असुन्दर और दर्शन में असत्य नहीं है, लेकिन प्रायः साहित्य विद्रूपता को भी अपनी शैली से पठनीय बना देता है और दर्शन सौन्दर्य को भी प्रायः इस रूप में प्रस्तुत करता है कि वैराग्य हो जाए। अरस्तू ने कभी सौन्दर्य शास्त्र के अंतर्गत कहा था- ‘‘कुरूपता भी यदि चित्रित हो जाए, तो वह सुन्दर हो जाती है" कला के लिए उनका यह कथन साहित्य पर भी चरितार्थ हो जाता है।

यहाँ प्रश्न सत्य का नहीं। ब्लेजी पास्कल ने कहा था- ‘‘हृदय के भी अपने सत्य होते हैं, जिनका प्रायः मस्तिष्क को पता नहीं होता।‘‘ निश्चय ही हम साहित्य में प्रदर्शित भावनाओं के सत्य को दर्शन में परिलक्षित बुद्धि के सत्य से कमतर नहीं देख सकते, कम से कम व्यवहार के धरातल पर तो बिल्कुल नहीं, क्योंकि वहाँ दोनों के ही सत्य को झुठला दिए जाने की समान संभावना है।

प्रश्न सौन्दर्य या आनंद का भी नहीं है। क्योंकि यहाँ सत्य की सी वस्तुनिष्ठता है ही नहीं। कहते है, “सौन्दर्य दृश्य में नहीं, दृष्टि में होता है (Beauty lies in the eyes of beholder)" बड़ी सीमा तक चरितार्थ होता ही है। कबीर या शंकर ने इस जगत् के सौन्दर्य की कदाचित् निन्दा भी की, तो शायद कारण यह था कि उन्होंने इस जगत् से परे के जगत् का बेहतर सौंदर्य देख लिया था। हम इसके विपरीत भी कह सकते हैं। संभव है, सांख्य में कपिल प्रकृति का वह रूप देख ही न पाए हों, जो कालिदास ने शाकुंतल में देख लिया हो।
वास्तविक प्रश्न ‘शिवत्व‘ का है। साहित्य का दावा है कि वह पूर्णतः ‘जगद्धिताय‘ है, क्योंकि वह ‘हित‘ शब्द से ही बना है। दर्शन का मानना है कि उसके पास ही सच्ची आखें हैं और उसके आगे साहित्य में तो बस तोतली बातें हैं।‘‘

प्लेटो तत्कालीन साहित्य से इतने खिन्न थे कि उन्होंने अपने आदर्श राज्य से साहित्यकारों को बाहर रखने का बीड़ा उठा लिया। कुरान मजीद में कहा गया है- ‘‘शायरों की पैरवी गुमराह लोग किया करते हैं। क्या तुमने देखा नहीं है कि वे हर वादी में सिर मारते रहते हैं।‘‘ (सूरा-26, आयत-224/224) साहित्य की कल्पना और बस कल्पना से दुःखी फ्रेडरिक नीत्शे ने साहित्यकारों को मक्कार मान लिया। विल्हेल्म गोटफ्रित्ज हीगेल ने भविष्यवाणी की थी कि मानव का चिन्तन जिस द्वंद्वात्मक विरोध के रास्ते से गुजरता है, उसमें साहित्य का छूटना और मिटना तय है, क्योंकि वह तार्किकता में न तो दर्शन को छू सकता है और न ही तथ्यात्मकता में विज्ञान को। कल्पनाओं, कथाओं और कविताओं की साहित्यिक जरूरत उनकी दृष्टि में ‘क‘ से ‘कबूतर‘ पढ़ने जैसी थी।

क्या सचमुच समाज में बढ़ती तथ्यात्मकता व तार्किकता साहित्य के लिए संकट है? अरस्तू ने मनुष्य की परिभाषा एक सामाजिक व तार्किक प्राणी के रूप में दी थी और ढाई हजार वर्षों से हम उसे ऐसा मानते भी आ रहे हैं। मगर सिग्मंड फ्रायड ने कहा था- ‘‘मनुष्य एक मिथ्या तार्किक प्राणी है। वह कार्य तो अपनी मूल वृत्ति व भावना के अनुरूप ही करता है, बस तर्क से उन्हें सही ठहराता रहता है।‘‘

तर्क पर प्रायः भावनाएँ हावी होती रही हैं। समाज वचन को तर्क के दुहराता रहा है, मगर आचरण में भावनाओं को ही अपनाता रहा है। इसीलिए अगर हम प्लेटो, हीगेल व नीत्शे के सुर में सुर मिला भी लें, तब भी साहित्य की भूमिका को अनदेखा नहीं कर सकते हैं। ऐसा लगता है, मनुष्य की तार्किकता साहित्य को जीने नहीं देगी और उसकी भावनात्मकता साहित्य को मरने भी नहीं देगी।

साहित्य समाज का दर्पण है” - यह उक्ति आधुनिक काल में बहुशः दुहराई गई है। मगर यह अर्द्धसत्य है। साहित्य इतिहास की तरह घटनाओं के यथातथ्य वर्णन में रुचि नहीं लेता, अन्यथा वह बस समाचार पत्र बन कर रह जाता और हर बीते दिन के साथ बिसरा दिया जाता। “साहित्यदर्पण” ग्रन्थ लिखने वाले विश्वनाथ को भी शायद साहित्य के दर्पण होने का विश्वास नहीं था, अन्यथा वे रस की बजाय यथार्थ को साहित्य का मानदण्ड मानते।

दर्पण भी पूरा सच कहाँ बताता है। वह दाएँ को बाएँ करके दिखाता है, गति को दुगुनी करके बताता है और आकृति बदल जाए, तो शक्ल भी बदलकर दिखाता है।

दर्पण तथागत है, वह वर्तमान में जीता है। दृश्य बदलने के साथ सारा परिदृश्य भी बदल जाता है। वर्तमान मात्र पर जीने वाला साहित्य दीर्घजीवी नहीं हो सकता दर्पण का आदर्श उसे दर्पण की तरह क्षणभंगुर भी बना देता है।

लेकिन वही साहित्य यदि गहरे तक उतर जाए, तो वह “दर्पण“ से “दर्शन“ बन जाता है। उसमें वर्तमान का यथार्थ तो होता है, किन्तु भविष्य का आदर्श भी होता है। तब उसके पास तरल आँसू ही नहीं होते, बल्कि तीसरी आँख भी होती है। वह वर्तमान विद्रूपताओं के विरुद्ध विषवमन तो करता है, किन्तु उनके निदान के लिए अमृतमंथन का उपक्रम भी जारी रखता है।

परन्तु क्या दर्शन ने ऐसे किसी अमृत को तलाश लिया है? कार्ल मार्क्स ने अपने पूर्ववर्ती दर्शन की आलोचना करते हुए कहा था -“दर्शन ने अब तक तो संसार की व्याख्या भर की है, लेकिन असली सवाल तो संसार को बदलने का है।"

बदलाव के लिए आँसू पर्याप्त नहीं होते। पसीना बहाने से वक्त बदलता है, मगर उसमें पहले पीढ़ियाँ बदल जाती हैं। तब शायद बदलाव को खून की जरूरत पड़े। फ्रेडरिक नीत्शे ने कहा था-“अब तक जो कुछ कहा गया है, उसमें मुझे बस वह प्रिय है, जो रक्त से लिखा गया है, क्योंकि ऐसे अक्षर कागज से पहले कलेजे में उतारे जाते हैं।“

सुकरात को जहर मिला, जीसस को सूली मिली, ब्रूनो को जिन्दा जलाया गया, टॉमस मोर की गर्दन गिलोटिन पर रखी गई, अल-हिल्लाज-मंसूर को कतरों में कत्ल किया गया और ऐसी जाने कितनी बानगियाँ है। दर्शन की राह पर चलने वाले साहित्यकारों ने भी कम नहीं सहा है। जहर के प्याले मीरा ने भी पिये। खलील जिब्रान को भी देशनिकाला मिला। तस्लीमा नसरीन को भी फतवे का सामना करना पड़ा।

साहित्यकार का सरोकार समाज से ज्यादा है और दर्शन का धर्म से। स्वाभाविक है कि साहित्यकार भी जब धर्म के क्षेत्र में अपने विचार रखता है, तब उसे उसी खतरे से रूबरू होना पड़ता है, जिससे प्रायः दार्शनिकों का वास्ता पड़ता रहा है। साहित्य के लिए सामाजिकता ही धर्म है और रोचक है कि धर्म की दुनिया में भी दर्शन से अधिक साहित्यकार प्रभावी होते रहे हैं, क्योंकि धर्म के प्राधिकारी प्रायः सामाजिक व्यक्ति होते हैं और उसके द्वार पर दस्तक देने वाले भी प्रायः सामाजिक अपेक्षाओं को लेकर ही आते रहे हैं।

दर्शन कई मायनों में असामाजिक रहा है और सामाजिक अर्थों में प्रायः अधार्मिक भी रहा है। साहित्य की तरह वह भी कल्पनाएँ गढ़ता है, किन्तु उसकी कल्पनाएँ सृष्टिपरक कम, दृष्टिपरक अधिक होती है। साहित्य पात्रों और चरित्रों से अपनी बातें रखवाता है, दार्शनिक स्वयं को ही पात्र व चरित्र बना देता है। साहित्यकार की मूल आकांक्षा है कि वह समाज का निदर्शक बन जाए, जबकि दार्शनिक की मूल आकांक्षा है कि वह समाज का निर्देशक बन जाए।

पर समाज भावनाओं के भरोसे ही नहीं चलता, अन्यथा साहित्य धर्मग्रन्थ की तरह पूज्य हो जाता। समाज तर्क के आधार पर भी नहीं चलता, अन्यथा दार्शनिक देवता की तरह श्रद्धेय हो जाते। जितनी दूरी तक समाज अपनी मूलवृत्ति से चलता है, उतनी दूर तक कामपरक साहित्य व अर्थपरक दर्शन के आगे परम्परागत कालजयी साहित्य व दर्शन दोनों को हाशिये पर खड़ा रहना ही पड़ता है। अखबारों में सुर्खियाँ बटोरने वाला साहित्य अखबारों की खबर की तरह की श्रमजीवी होने को अभिशप्त है। शक्तिमता और अर्थसंपन्नता के दर्शन को अपनाने वाले समाज के समक्ष प्रबन्धन गुरुओं की तूती बोलती तो है, मगर उसे भी शीघ्र नक्कारखाने की तूती बनकर तिरोहित होना ही पड़ता है।

परंपरा के असफल हो चुकने के अपने साक्ष्य है और आधुनिकता के भी असफल हो जाने की अपनी भविष्यवाणियाँ है। कभी हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ‘पुनर्नवा’ का उपाख्यान करते हुए ठीक ही कहा था कि अगर विचार के साथ व्यवस्थाएँ नहीं बदली तो अंततः व्यवस्थाएँ तो बदलेंगी ही, अपने साथ समाज को भी तोड़ देंगी।

माना जाता है कि समय के साथ दर्शन उतना दृष्टिहीन नहीं हुआ है, जितना कि साहित्य सतही हो गया है। बकौल जॉन गेटे “साहित्यकार अपनी स्याही में पानी कुछ ज्यादा ही मिलाने लगे हैं।" कागज और कलेवर में चमक आ गई है, मगर अक्षर फीके पड़ने लगे हैं।
कारण क्या है? नए साहित्यकार कहते हैं-“गहरा साहित्य कोई पढ़ना नहीं चाहता।“ पुराने साहित्यकार कहते हैं-“साहित्यकार स्वयं भी कुछ पढ़ना नहीं चाहता।“ जॉर्ज लिचेनबेरी ने ठीक ही कहा था, “साहित्य की रोचक विडम्बना है। इसके मुद्रण का कार्य वे करते हैं, जो इसे नहीं पढ़ते। इसके प्रकाशन व विक्रय का कार्य वे करते हैं, जो इसे नहीं पढ़ते और अब इसके लेखन का भी कार्य वे करते हैं, जो इसे नहीं पढ़ते।“

साहित्यकार अब सार्थक पाठक नहीं रहा, इसलिए वह सार्थक लेखक भी नहीं रहा। इमर्सन ने ठीक ही कहा था- “जिसके लिखने में कोई अध्ययन और प्रयत्न नहीं किया जाता, उसके पढ़ने में भी आनंद नहीं पाया जा सकता।“

युग के साथ युगधर्म भी बदलता है। समाचार पत्र ही आज प्रातः का साहित्य है और दूरदर्शन ही आज का निशा-दर्शन। हम फेसबुक पर अध्ययन के और गूगल पर अन्वेषण के अभ्यस्त हो चुके हैं। जिन्हें कल ‘क्लासिक’ का दर्जा दिया जाता था, वे ‘क्लास’ और ‘शेल्फ’ दोनों से विलुप्त हो चुकी हैं। क्लासिक के लिए मार्क ट्वेन ने कभी कहा था-“यह वह साहित्य है, जिसे रखना तो सब चाहते हैं, लेकिन पढ़ना कोई नहीं चाहता।“

साहित्य के लिए यह संकट नया है, परन्तु यह संकट परंपरागत साहित्य के लिए ही है। हैरी पॉटर की जादुई किताब करोड़ों में बिक कर अरबों का लाभ दे जाती है, जबकि ‘‘दास कैपिटल’’ और ‘‘दस स्पोक जस्थुस्त्रा’’ को प्रकाशन के समय सौ पाठक भी नहीं मिल पाते।

साहित्य के क्षेत्र में गहरे पाठकों का अभाव अब हुआ है, किन्तु दर्शन के क्षेत्र में यह अभाव शाश्वत रहा है। जो दार्शनिक प्रकृति का साहित्य लोकप्रिय था, वह भी जन सामान्य में ‘पाठ’ का विषय अधिक था, ‘‘अध्ययन’’ के विषय कम। वैसे श्वेत हंसों के लाए फल हरित शुकों को मधुर प्रतीत होने लगे, इसमें कुछ अन्यथा भी नहीं है, क्योंकि मानव जगत् में शुकदेव मुनि भी परमहंस ऋषियों से कमतर नहीं होते। पुराणों में, धार्मिक महाकाव्यों में साहित्य से कमतर दर्शन निःसृत नहीं होता और प्रायः दार्शनिक सूत्रों और आध्यात्मिक मंत्रों से अधिक ही प्रभावी होता है।

सच कहूँ, तो यहीं से दर्शन और साहित्य के मध्य सुन्दर संतुलन सूत्र मिलता है । सर्वश्रेष्ठ साहित्य वह है, जो अपने भीतर सुंदरतम दर्शन समाहित किए हुए हो और सुंदरतम दर्शन वह है, जो साहित्य का स्तर प्राप्त कर ले। साहित्य में दर्शन की आँख हो और दर्शन में साहित्य के पर, तो शायद यह मणिकांचन संयोग हो। अंत में एक दार्शनिक अरस्तू के शब्दों में ‘‘साहित्य कई बार इतिहास की तुलना में अधिक परिष्कृत और दार्शनिक होता है, क्योंकि इतिहास जहाँ कुछ विशिष्टों तक सीमित रह जाता है, वहीं साहित्य सार्वभौम बन जाता है।‘‘

पाषाण युग से पाषाण युग तक

पाषाण युग से पाषाण युग तक
मेरे नागर मन।
इस संभ्रांत शहर में क्लांत तन और अशांत मन लिये लौटा हूँ । सुबह की आहट के साथ चहचहाहट लिए दिन की शुरूआत करने, फिर सुदूर आकाश और धरती पर तिनके और दाने तलाशने के बाद घरौंदों में लौट आने वाले तमाम परिंदों में मैं भी हूं, बस फर्क यह है कि मैं गोधूलि के धंुधलके की बजाए गाड़ियों के धुएँ में लौटता हूँ और मेरा आकाश तारों की झिलमिलाहट की बजाए सड़कों की जगमगाहट से रौशन होता है।
कितना बड़ा शहर है? शहर है या सागर है ! हर कदम विलीन हो जाने की आशंका है। सड़क पर दौड़ती गाड़ियाँ कब उफनती लहरों की तरह निकलती हैं और ट्रैफिक के तट से टकराकर मद्धम पड़ जाती हैं, पता ही नहीं चलता।
सागर विशाल है, मगर खारा है, तट सुरम्य है, लेकिन रेतीला है। मन इस महासागर में नौका लेकर निकल पड़ता है और लहरों में खोए द्वीपों की तलाश में भटक पड़ता है-- किसी जहाज के पंछी की तरह। इस पंछी को जहाज पर लौट आना है, पर कुछ पल के लिए ये तलाश बुरी नहीं है।
कुल चार लाख सालों में हमारी प्रजाति चालीस हजार साल से पाषाण युग में जी रही है। फर्क यह है कि तब पत्थर की कंदराएँ थी, पत्थर के हथियार थे, पत्थर के औजार थे और अब पथरीली सड़कें हैं, पथरीले घर हैं, पथरीली दुनिया है और ये पथरीलापन भी कृत्रिम है, जिसे कंक्रीट कहते हैं। कुछ लोग तो कहते आए है कि वन्य युग खत्म ही नहीं हुआ है, भेद बस यह आया है कि दरख्तों के जंगल की बजाए कंक्रीट के जंगल उठ खड़े हुए हैं।
पुरातन पाषाणयुग धातुयुग से गुजरता हुआ आज के जिस नवीन कृत्रिम पाषाणयुग में पहुँचा है, उसमें कुछ टूटी या अनदेखी कड़ियाँ भी हैं। ये युग हैं- मृदा युग, काष्ठ युग और बहुलक युग।आइये इन्हें जरा अलग से देखें-
आज से दस हजार साल पहले हमने मिट्टी र्को इंट बनाने की कला सीखी थी, गूँथकर, ढालकर, तपाकर और यह कला आज भी उतनी सार्थकता से जी रही है- सिंधु घाटी के नगरों से मौर्यकालीन स्तूपों तक, सड़कों-दीवारों से अट्टालिकाओं तक। तब हमने र्‘इंट का जवाब पत्थर‘ में नहीं, ‘पत्थर का जवाब ईंट‘ में तलाशा था।
काष्ठयुग हमारे इतिहासकारों की दृष्टि से न जाने क्यों अदृश्य रहा युग है। हमने पत्थर के हथियार तो बाद में बनाए, उससे पहले ही लाठी, डंडे व मुग्दर आ चुके थे। पत्थर के औजारों की जगह जब धातु के औजारों ने ली, तब भी कुल्हाड़ी, फावड़े, फरसे, भाले, तीर-धनुष, नाव-पतवार में वह साथ-साथ भूमिका निभाता रहा। पुरानी पर्णशालाओं और झोंपड़ियों का युग तो शायद खत्म ही नहीं हुआ, नगर संरचना में वे स्तंभों, शहतीरों, मंडपों आदि के रूप में आधारभूत तत्व बना रहा। काठमाण्डू में तो काष्ठ और इष्ट (ईंट) का इतना मंजुल प्रयोग हुआ कि भारत में उसे ‘काष्ठमंडप‘ नाम से जाना गया।
पाषाणी भवन निर्माण कला में धातुओं ने पत्थरों को जोड़ने की बजाए उनको तोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, विशेषतः लोहे ने। पाषाण को तराशने की कला पूरे प्राचीन और मध्यकाल की अनमोल विरासत है, लेकिन अठारहवीं सदी के अंत और उन्नीसवीं सदी के आरंभ में सीमेंट के रूप पत्थर बनाने की जो विधा विकसित हुई, उसने कला और विज्ञान के रूप ही बदल दिए। इसके साथ धातु अनिवार्य तत्व के रूप में जुड़ गई, वही फौलादी धातु, जो सरिये में थी, गार्डर्स में भी हर जोड़ में थी, हर खिंचाव में थी, हर आधार में थी।
धातु की धमक आज भी मौजूद है, मगर उसके साथ नई चीजों ने जगह जमा ली हैं- शीशे ने, फाइबर ने, प्लास्टिक ने, टाइल्स ने। इन विकल्पों ने शक्ति तो न बढ़ाई, पर सौंदर्य में चार चाँद लगा दिये, सुविधाओं में हजार इजाफा कर दिया।
आदमी से घर बनते हैं और घरों से गाँव और शहर बनते हैं। आदमियों की एक बस्ती गाँव है, क्योंकि वहाँ खेत हैं, चारागाह हैं। आदमियों की दूसरी बस्ती शहर है, क्योंकि वहाँ उद्योग हैं, व्यापार हैं। पर एक फर्क और है- गाँव वह है, जहाँ आदमी जानवरों के साथ रहकर भी उस तरह पशु नहीं बना, जिस तरह शहरों में आदमी मशीनों के साथ रहकर यांत्रिक हो गया।
लोग मानते हैं, शहर थोड़े ज्यादा शिक्षित हैं, संभ्रांत हैं, साफ सुथरे हैं, गाँव थोड़े अधिक निरक्षर हैं, गँवार हैं, गंदे हैं। ये बस अर्द्धसत्य हैं और इसमें भी बहुत कुछ बस दृष्टिकोण है। सबसे बड़ा फर्क है कि गाँव सुविधाविहीन हैं, शहर सुविधासंपन्न हैं। पर शहरों की सुविधा के अपने संकट भी हैं। उसकी सुविधा में प्रदूषण है, उसकी चकाचैंध में शोर-शराबा है, उसके पक्के मकानों में दड़बापन है, उसकी सभ्यता में अनजानापन है, उसकी दौड़-भाग में रंेगती हुई जिन्दगी है, धुंध है, घुटन है।
शहर बढ़ते जा रहे हैं और शहर से दूर के गाँव उजड़ते जा रहे हैं। सौ साल पहले जहाँ लगभग दस फीसदी आबादी शहरों में रहती थी, आज वहाँ एक तिहाई आबादी रह रही है। आबादी बढ़ने की दर तो घट रही है, मगर शहरों की आबादी बढ़ती दर से बढ़ रही है। वे दिन बीत गए, जब अर्थशास्त्र में सब पढ़ते थे कि हमारी तीन-चैथाई जनसंख्या गाँवों में बसती है और वह दिन भी दूर नहीं जब यह अनुपात बदल जाएगा और यह स्थिति रेखाचित्र में एक गुणा या क्रास की तरह दिखाई देगी।
एक मान्यता है, गाँव वह है, जो प्राकृतिक है और शहर वह है, जो कृत्रिम है। यह बहुत कुछ सही भी है। ऐसा नहीं कि गाँव के भोजन, वस्त्र, आवास कृत्रिम नहीं हैं, लेकिन वे न केवल प्रकृति के अधिक अनुकूल हैं, बल्कि हमारी स्वाभाविक विकासात्मक प्रक्रिया से उपजे हैं। गाँव बसते चले गए और नगर बसाने पड़े। दुनिया के अधिकांश शहर एक व्यवस्थित निर्माण से प्रारंभ हुए थे। इस व्यवस्थित निर्माण में ही उसकी संरचना का सौन्दर्य था, सुविधा थी, स्वच्छता थी और जिस दिन यह व्यवस्था टूटी, वे कस्बे भी न रहे, दड़बे बन गए, झुग्गी बन गए, धारावी बन गए। एक ऐसी बसावट जहाँ पुरापाषाण युग के पत्थर थे, मृदा युग की ईंटे थीं, लौह युग के टिन शेड थे, वन्य-काष्ठ युग की झोपड़ियाँ थीं और आधुनिक युग के नाम पर प्लास्टिक के चँदोवे थे। नालियाँ सड़कों पर ही निकलती और घर तथा टायलेट में प्रायः फर्क नहीं होता।
आदमी गृहस्थ तो तब हुआ, जब उसने गृह बनाने की कला सीखी। यूँ तो दीमकों और चीटिंयों भी बाँबियाँ बना लेती हैं, ततैया और मधुमक्खियाँ भी छत्ते बना लेते हैं, मगर आदमी के घर और नगर विशिष्ट होते हैं। यह विशिष्टता परिलक्षित होती है- संरचना में, स्वच्छता में और सुविधा में। एक दृष्टि से, ग्राम और नगर का भेद इन्हीं तीन आधारों पर खड़ा होता है या यूँ कहें कि खड़ा होना चाहिए।
प्रारंभ संरचना से करते हैं। नगर के लिए यह बिन्दु तीन कारणों से महत्वपूर्ण हो जाता है। पहला, नगर की जनसंख्या वृद्धि में उसकी स्वाभाविक जन्म दर की बजाए उसकी आव्रजन दर से जुड़ी होती है। यह वह जनसंख्या होती है, जो आजीविका के लिए आ रही होती है और जहाँ भी जगह मिले, बस रही होती है। दूसरा, नगर की इस तमाम अस्वाभाविक व अराजक वृद्धि दर के बावजूद उसमें नियंत्रित होने की चेतना व व्यवस्थित होने की शक्ति रहती है और अगर ठीक से व्यवस्था की जाए, तो सरलतया सुरूचिपूर्ण सुन्दर संरचना में ढल सकती है। तीसरा, शहर अपने विस्तार के साथ जब परिधि की ओर बढ़ता है, तो उस हाशिये पर बसने के लिए सबसे अधिक उत्सुक कभी केन्द्र में रह रहे समृद्ध और संभ्रांतजन ही होते है, क्योंकि वे अपनी तंग गलियों और बंद गलियारों की घुटन से तंग आ चुके होते हैं और अगर सचमुच बेहतर व्यवस्था की जाए, तो वे ऊँची से ऊँची कीमत देने को तैयार हो जाते हैं।
यही ऊँची कीमत एक नए तबके को जन्म देती है, जिसे हम बिल्डर, कालोनाईजर प्रापर्टी-डीलर और भू-माफिया के रूप में हर जगह फैला हुआ पाते हैं। सबसे रोचक है कि शहर अपने विस्तार के साथ सबसे पहले गाँव तक पहुँचता है, मगर गाँव का कृषक व भूस्वामी कालोनियाँ नहीं बनाता, प्रापर्टी डीलिंग नहीं करता, बिल्डर नहीं बन पाता: वह बस यह कर पाता है कि कुछ लाख में अपनी भूमि इसके उक्त प्रोफेशनल वर्ग को दे दे, जो महज कागजों पर रेखाएँ खींचकर और दफ्तरों से निकलवा कर उसे करोडों की कीमत में तब्दील करवा सके। दुनिया में उससे सफल और सबल सौदे की कोई दूसरी बानगी संभव ही नहीं है।
भूमि माता है, यह हर कोई जानता और मानता है, सिवाय इस नवसंभ्रांत-नवसमृद्ध-नवभूस्वामी वर्ग के। भूमि से अधिक सुरक्षित, सुखद और सुफल कोई व्यवसाय नहीं, क्योंकि संसार में सब चीज की कीमत गिर सकती है, मगर भूमि की नहीं और इसका कारण यह है कि हर चीज का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है, मगर धरती नहीं बढ़ाई जा सकती और उस पर अगर यह वह धरती हो, जो सात अरब से अधिक आदमियों से भरी हो, प्रति मिनट ढाई सौ लोगों को धरती पर जन्म देती रहती हो, सबसे अधिक आबादी वाले और सबसे अधिक आबादी दर वाले देश से जुड़ी हो, तो फिर घाटे की गुंजाइश ही नहीं।
भारत वह देश है, जिसने संसार भर में सबसे पुरातन और सबसे व्यवस्थित नगर संरचना के आदर्श प्रस्तुत किए। बेबीलोनिया, सुमेरिया, मेसोपोटामिया, माया, इंका, एज्टेक, इजिप्ट कहीं भी इससे बेहतर नगर संरचना के दृष्टांत नहीं हैं। मध्यकाल में देशी रजवाड़ों और बादशाहों में से अनेक ने विरासतों और महलों ही नहीं, शहरों की बुनावट व बसावट पर भी उतना ही ध्यान दिया। इतिहास में ऐसे भी वक्त और सुलतान रहे, जिन्होंने अपने नाम पर नगर बसाने की जिद में और दीवानगी की मिसालें ही कायम कर दी। पर प्राचीन काल से मध्यकाल और सच कहें तो आधुनिक काल में भी उपनिवेशकाल तक नगरीकरण की जो दर रही है, वह बस सहज सी बढ़ती दर रही है। पर उस दासता की रंध्रों से भी स्थापत्य में आधुनिकता की नूतन बयार आती रही। मुगल शैली के सौंदर्य की जगह यूरोप के रास्ते आई रोमन-गोथिक शैली के प्रभाव ने शहर की संरचना को एक नया वैभव दिया।
सच कहें, तो 18-19 वीं सदी मेें भारतीय स्थापत्य और वास्तुकला को एक नया ढँाचा प्रदान किया। ब्रिटिश शासकों ने यूरोपीय वैभव को रोमन-गोथिक शैली के रूप में भारत में लाना चाहा था, परन्तु शीघ्र की उन्होंने  पाया कि यह शैली अपने आप में भारत के लिए अपूर्व और अपर्याप्त है। फिर तत्कालीन भारतीय शैली, जिसमें तुर्क-मुगल शैली का प्रभुत्व था के रोमन-गोथिक शैली से मिश्रण कर एक नई शैली को जन्म दिया, जिसे ’’इंडो-सारासैनिक’’ शैली कहा गया। दरअसल यह सारासैनिक शब्द रोमन लोगो द्वारा इन अरबी-मरूस्थलीय कबीलों के लिए प्रयुक्त होता था, जिसनें मूल अरबी-संस्कृति से भिन्नता थी। मध्यकाल में यूरोप में इसे मुस्लिम संस्कृति का पर्याय मान लिया गया और आधुनिक काल में तुर्क-मुगल स्थापत्य का, जिसमें भारतीय स्थापत्य कला का मिश्रण हो गया था। इस शैली के प्रसार सथापत्य कला का मिश्रण हो गया था। इस शैली के प्रसान में राबर्ट चिशोल्म, चाल्र्स मैंट, हेनरी इरविल, विलियम इमर्सन, जार्ज विटेट, गिलबर्ट स्काट, फ्रेडरिक स्टीवेंस, विलियम हौजेज आदि का योगदान तो था ही, साथ ही अनेक शासकों के स्वप्नों ने साकार रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उदाहरणार्थ, अजमेर में मेयो कालेज की स्थपना के समय लार्ड मेयो ने पहले इसे रोमन शैली में बनवाना चाहा था, लेकिन तत्समय ही उसे ध्यान आया कि यदि भारतीयों को शिक्षा से जोड़ना है, तो बिना भारतीय स्थापत्य के प्रयोग के उन्हें आकर्षित करना कठिन होगा। फिर जो मेयो कालेज बना, उसमें मुगल व राजपुताना शैली का ही प्रभुत्व रहा।
            यह “इंडो सारासैनिक” शैली अपने गुम्बदों झरोखों, मेहराबों, मीनारों, छतरियों, छज्जों, कंगूरों, खम्भों आदि के वैशिष्ट्य के कारण इतनी सुन्दर थी कि जैसे ही डैनियल-द्वय (विलियम डैनियल व टामस डैनियल) ने इसके कतिपय चित्रों को ब्रिटेन में प्रकाशित किया, स्वयं वहाँ के स्थापत्य में इसे अपनाने की होड़ मच गई। अंग्रेजों ने अपनी श्रेष्ठता को प्रदर्शित करने के लिए अपने जिस स्थापत्य वैभव को प्रकाशित करने की सोची वह अंततः भारतीय वैभव के साथ उनके पास लौट गई।
            संयोग से भवन नगर का यह वैभव अंग्रेज शासित और निवासित भारतीय शहरों में बड़े पैमाने पर परिलक्षित हुआ। अगर हम दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चैन्नई जैसे महा-महानगरों को थोडी देर के लिए किनारे रख दें या अजमेर, इलाहाबाद, जैसे अपेक्षाकृत लघुनगरों की भी आज की स्थिति में हाशिये पर रख दें, तो पाएँगे कि यह स्थापत्य मूलतः पर्वतों पर खूबसूरती के साथ पनपा और पल्लवित-पुष्पित हुआ। विशेषतः शिमला जो अंग्रेजों की ग्रीष्मकालीन या कहें कि अधिकांशकालीन राजधानी थी, माऊँट आबू जो राजपुताने में अंग्रजो की  ऐसी ही राजधानी थी, मसूरी, दार्जीलिंग, नैनीताल, श्रीनगर, ऊटी में इसके सुदरतम दृष्टांत हैं। जहाँ तक मेरी जानकारी है, इनमें शिमला के अतिरिक्त अन्य शायद ही किसी शहर में विरासत के भवनों को अधिनियम बनाकर संरक्षित करने की कोशिश की गई। राजस्थान के राजतंत्रकालीन नगरों के वैभव संसार को आकर्षित कर सकते थे, लेकिन इनमें जैसलमेर और कुछ अंश तक जयपुर के अतिरिक्त शायद ही किसी शहर को उसके मूल स्वरूप में बचाने की कोशिश की गई हो। यहाँ शेखावटी की चित्रित हवेलियाँ बदल गई, बीकानेर की लाल पत्थरों की झरोखेदार हवेलियाँ खो गई, बँूदी की भित्तिचित्रित कला वाली हवेलियाँ खो गईं, माऊंट आबू के अनेक ब्रिटिश भवनों के बाह्य स्वरूप बदल गए, जोधपुर के नीले अंतःकरण वाले पाषाणी शिल्प बदल गये और ऐसा केवल राजस्थान में ही हुआ, यह बात नहीं है। हम हैदराबाद के चारमीनार के पास के उन सुन्दर परिक्षेत्रों को देख लें, कोलकाता की सड़कों को देख लें, दिल्ली के चांदनी चैक को देख लें, बंगलूरू के पार्क-भिन्न क्षेत्रों को ले लें, सर्वत्र यही स्थिति है। यहाँ कोई वेनिस नहीं बचा, कोई पेरिस नहीं बना, कोई रोम नहीं बसा। कहते हैं- रोम एक दिन में नहीं बना, लेकिन रोम एक दिन में उजडा भी नहीं। हमने अपने नगरों को सदियों ही नहीें सहस्राब्दियों में बसाया था और उसे दशकों हीे नहीें कई बार सालों में ही बिगाड़ दिया।
खैर, हम अंग्रेजी युग को देख रहे थे। तब हमने मुंबई, कोलकाता और दिल्ली अर्थात तब के बाम्बे, कलकत्ता और देल्ही के रूप में बिल्कुल बदला स्वरूप पाया। हम इसे दिल्ली के इण्डिया गेट, कनाट प्लेस, संसद या राष्ट्रपति भवन, मुम्बई के गेटवे आफ इण्डिया या छत्रपति शिवाजी टर्मिनस, मुंबई वी.टी. स्टेशन और कोलकता के विक्टोरिया मेमोरियल या रेसकोर्स तक सीमित नहीं करके देख सकते, बल्कि उस स्तर तक लेकर जाना होगा, जहाँ सिविल लाइंस और माल रोड के माडल उपजते हैं, जहाँ क्लाक टावर और टाऊन हाल के स्थापत्य ढलते हैं जहांँ रेलवे स्टेशन, कोर्टयार्ड, कालेज, म्यूनिसिपल भवन आदि के आदर्श प्रारूप बनते हैं, जहाँ जाब चार्नाक और एडविन ल्यूटियेंस के सपने पलते हैं और यह भी कि जहाँ औद्योगिक क्रांति से उपजती गंदगी फैलती है, जहाँ मजदूरांे की खोलियाँ और बाड़ियाँ बनती है।
संरचना का स्वरूप बहुत हद तक स्वच्छता का रूप भी बता देता है। संैधव सभ्यता केवल अपनी चैड़ी सड़कों, समकोण पर काटते चैराहों और पक्के घरों के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि पक्की और ढकी नालियों के लिए भी जानी जाती है। यह शायद पहली ऐसी नगरीय संरचना थी, जहाँ गलियों और नालियों में स्पष्ट भेद रखा गया था और दोनों की समानांतर किन्तु पक्की व्यवस्था की गई थी। स्वच्छता आज भी हमारी सबसे बड़ी समस्या है। यह भारतीय जनमानस है, जिसे पवित्रताबोध तो बहुत है, परंतु स्वच्छता बोध बहुत कम है। हम अपने घर में झाडू लगाते हैं, मगर द्वार पर लाकर भूल जाते हैं, हमारे हाथ कचरे को उठाने में नहीं हिचकते, मगर कचरे के उठने तक पहुँचने में कम जाते हैं, हम गलियारों की दीवारों को पीक से रँगने में, सड़क की फुटपाथों और रेल की पटरियों और पाश्र्वों को, सार्वजनिक शौचालय-मूत्रालय बनाने से नहीं हिचकते। हमारी स्वच्छता की पोल इन सबसे बढ़कर प्लास्टिक की थैलियों ने खोल दी, जो इस चीज़ की हमारी उपयोगिता और हमारी उपभोगशीलता पर प्रश्न उठाती है और अब सुविधा। सुविधा किसकी? भोजन, वस्त्र और आवास की? नहीं, शायद बहुरंगे और वैविध्यपूर्ण भोजन-वस्त्र और आवास की। पर शहर की चाहत रोटी, कपड़ा और मकान की चाहत से बढ़कर है। वहाँ सुविधा का प्राथमिक तात्पर्य है। सुविधा शिक्षा की, स्वास्थ्य की, संपर्क-संसाधनों की। व्यक्ति नगर की ओर दौड़ता है- केवल एक अंतहीन तृषा वाली भोगवृत्ति और विलासिता के लिए ही नहीं, बल्कि एक बेहतर अथवा न्यूनतम स्तर की शैक्षणिक, चिकित्सकीय और आजीविकीय अनिवार्यता के लिए भी। आदमी अगर गाँव की खुली प्रकृति को छोड़कर शहर की दीमकों की बाँबियों जैसी झुग्गियों या फिर ततैये के छत्तों जैसी कालोनियों में रहने को ही अपनी नियति मान लेताहै, तो इसका आधारभूत कारण नहीं आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति है। यह पूर्ति भी उसकी स्वयं की अनिवार्यता की अपेक्षा उसकी भावी पीढ़ी की अनिवार्यता से अधिक जुड़ी होती है, अन्यथा हम अपनी जड़ों से जुड़े रहने की ललक को यूँ नहीं दबाते और न ही ग्राम के शांत-विस्तार के संसार को छोड़ इस भाग-दौड़, शोर-शराबे, घुटन-प्रदूषण भरी दुनिया में रच-बस न जाते।
सुविधाएँ किसकी? शिक्षा की, स्वास्थ्य की, संपर्क-संसाधनों की, बाजार की, रोजगार की, बिजली की, पानी की। कह सकते हैं, तृष्णाएँ तो मृगमरीचिका हैं, ये माँग तो अनंत तक फैलती रह सकती हैं। उपभोक्तावाद के इस संसार में विलासिता और अनिवार्यता में भेद मिटता जाएगा और कल हम हर चीज को अपनी जरूरत मान सकते हैं- सिनेमा हाल को, शापिंग माल को, मेट्रो रेल को, डिज्नीलैण्ड के खेल को, डिस्काउंट भरे सेल को, पार्क को, पार्किंग को और न जाने क्या-क्या। ये अपेक्षाएंँ बहुत गलत भी नहीं है, क्योंकि इसी की प्रेरणा और प्रत्याशा में विकास भी होता है। भौतिकवादी शक्तियाँ इन्हीं चकाचैंधों से हमें अपनी ओर बुलाती हैं और संवृद्धि के नए रास्ते सुझाती है।
            समस्या यह है कि संसाधन सदा सीमित होते हैं और आवश्यकताओं की तुलना में वे सदा कमतर सि˜होते हैं। पर इससे बड़ी समस्या दूरदर्शिता की है। शहर सपनों से बसाते हैं। उस तक आने और बसने वालों के ही आँखों में सपने नहीं पलते, बल्कि उन्हें बसानेवालों की आँखों में भी सपने होने चाहिए ऐसे सपने, जैसे विश्वकर्मा ने विश्व कि विषय में देखे थे, यक्षों ने आलका और राक्षसों ने लंका के लिए देखे थे, चाणक्य ने मगध, जयसिंह ने जयपुर, गंगासिंह ने गंगानगर, जाब चार्नाक ने कलकत्ता, एडविन ल्यूटियेंस ने दिल्ली, ली कर्बूसियर ने चण्डीगढ़ के लिए देखे थेे और यह तो केवल बानगी है। ऐसे भारत में सैकड़ों शहर हैं जो राजतंत्र में पनपे, उपनिवेशवाद में विकसित हुए, लेकिन विरोधाभासी रूप में लोकतंत्र में नष्ट हो गए।
वर्ष 1992 का समय भारतीय लोक प्रशासन में ऐतिहासक परिवर्तन का समय रहा हैै। यह वह समय है जब 73वंे संशोधन द्वारा पंचयती राज और 74वें संशोधन द्वारा शहरी स्वायत्तशासन को स्वीकृति दी गई। नगरपालिकाओं, नगर परिषदों और नगर निगमों को अधिक स्वायत्तता तो मिली, पर अलग दृष्टि न मिली और सबसे बड़ी बात कि उन्हंे अपेक्षित राजस्व संसाधन ही नहीं मिले। ऐसा नीं कि टाऊन प्लानर्स ने टाऊन प्लानिंग नहीं की, सरकारों में परियोजनाएँ नहीं बनाई, सार्वजनिक निर्माण विभाग ने सड़कें और भवन नहीं बनाए, पर पूरी प्रक्रिया में ऐसी कुछ तो कमी रही कि दूरगामी लक्ष्य तो दूर, सामान्य अपेक्षाएं भी पूरी नहीं हो पाईं। नगर निकायों में छोटे स्तर के मुहल्ले हैं, पर उससे अधिक छोटी सोच सामने आ जाती है। राजस्थान में जो नगर निकाय के अधिशाषी अधिकारी लगाए जाते हैं, उनका विधि का विशेषज्ञ होना तो आवश्यक है, पर टाऊन प्लानिंग का विशेषज्ञ होना आवश्यक नहीं है। पूरे सरकारी तंत्र का सार्वजनिक निर्माण विभाग लोक प्रशासन की सामान्य प्रक्रियाओं के प्रतिकूल खड़ा होता है। जहाँ कार्य का आंकलन करने वाली एजेंसी, उसका क्रियान्वयन करने वाली एजेंसी और मूल्यांकन करने वाली एजेंसी तीनों एक ही हों, तो न कार्य में गुणवत्ता लाई जा सकती है और न हीे सार्वजनिक धन के अपव्यय का भ्रष्टाचार में कमी लाई जा सकती है। जहाँ अंग्रेजी के तीन ‘ई‘ (एस्टीमेशन, एक्जीक्यूशन और इवेल्यूएशन) एक ही एजंेसी में केंद्रित हो जाएं, वहाँ एफिशिऐंसी और इकोनामी की अपेक्षा करना बेमानी है। तथा यही कारण नहीं है कि हम आजादी के बाद के बने लाखों भवनाों में बमुश्किल दर्जन भर भवनों को भी सौंदर्य और सौष्ठव दोनों मानदण्डांे पर खरा नहीं बता पाते। हजारों मील की सड़कों पर सौ सालों से चलती हुई अभियांत्रिकी यदि भ्रष्ट और दृष्टिविहीन हुई है, तो इसमें केवल अभियंता ही नहीं, प्रशासक व शासक भी उतने ही भागीदार हैं, क्योंकि उन्होंने तंत्र के सुधार की कोई वजनदार कोशिश नहीं की। जिस प्रकार चिकित्सा के पेशे में ‘प्रेस्क्रिप्शन‘ व डायग्नोसिस के आधार पर तमाम कमाई के संसाधन पनपते रहे, वैसे ही अभियांत्रिकी में ‘मेजरमेंट बुक‘ व ‘प्रोचेक्ट एस्टीमेट‘ की तकनीकी शब्दावलियों में भ्रष्टाचार की जगह बनती रही। अगर इन कागजी चीजों को ही केवल आवश्यक रूप से देशी भाषा में लिखना अनिवार्य कर दिया जाए, तो आधी समस्या दूर हो जाए। यह समझ नहीं आता कि महात्मा गाँधी नरेगा जैसे कार्यक्रमांे का सोशल आडिट कराने की हिम्मत दिखाने वाली सरकारी प्रक्रिया सार्वजनिक निर्माण विभाग, जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी  विभाग, नगर निगम आदि के कार्यों की सोशल आडिट से हिम्मत क्यों नहीं जुटा पाती। यह तब है कि जब किसी भी राज्य सरकार की बजट का एक-तिहाई या एक चैथाई तक इन्हीं मदों में और ऐसी विभागों द्वारा खर्च किया जाता है और फिर सैकड़ों करोड़ खर्च कर भारत-निर्माण के रूप में प्रचारित-प्रसारित किया जाता है।
नगर आयोजना प्रायः संसाधन हीनता के साथ-साथ दूरदृष्टिहीनता से जूझती रहती है। नई कालोनियाँ बसती हैं, पर स्कूल पुराने मुहल्लों में रह जाते हैं। कहीं एक ही मुहल्ले में चार विद्यालय मिलेंगे और कहीं हजारों की आबादी पर एक भी नहीं। नई सड़क बनाते समय अगले साल या अगले माह ही बिछनेवाली सीवर लाईन या टेलीफोन लाईन का ध्यान नहीं रहता। सेट-बैक छोड़ना तो दूर, सरकारी भूमि पर हुए अतिक्रमणों को हर साल पंचवर्षीय योजना की तरह नियमित करने की प्रक्रिया चलती ही रहती है और आखिर गरीबों को वंचित भी कैसे किया जाए, उन्हें शहर में कहीं तो बसाना ही पड़ेगा, वरना वह तथाकथित बुर्जुआ संभ्रांत वर्ग घर में काम करने के लिए बाल मजदूर कहाँ से पाएगा, झाडू-पोंछा के लिए बाइयाँ कहाँ से लाएगा, रिक्शे कैसे चलेंगे, कपड़े कैसे धुलंेगे, दूध और अखबार कैसे बँटेगे, निर्माण कार्य के लिए मजदूर कैसे मिलेंगे, गलियाँ व नालियाँ कैसे साफ होंगी, कचरे कैसे उठेंगे, कुल मिलाकर हमें शहरी बनाने के समस्त मानवीय संसाधन कैसे जुटंेगे।
तरुण माक्र्स ने एकाकीपन या अलगाव के लिए जो ‘एलीनेशन‘ की धारणा दी थी, वह शहरों में बुर्जुआ व सर्वहारा दोनों के लिए समान रूप से चरितार्थ होती है। मजदूर के पास अपने व्यक्तित्व को विकसित कर पाने के साधन नहीं हैं और संभ्रांत के पास पैसे के बल पर व्यक्तित्व के झूठे आयाम पाने के तमाम संसाधन हैं। रूसो ने कभी समानता के लिए कहा था कि किसी के पास इतना अधिक भी न हो कि वह दूसरों को खरीद सके और किसी के पास इतना भी कम न हो कि वह खुद को बेचने को राजी हो जाए। विल्फ्रडो परेटो ने असमानता पर कभी 80: 20 का नियम दिया था। हमारे 80 प्रतिात संसाधनों पर 20 प्रतिशत आबादी का स्वामित्व होता है और 80 प्रतिशत आबादी 20 प्रतिशत संसाधनों पर जीविका चलाती है। यह अंतराल नगरों में सर्वाधिक प्रखर रूप में दृश्यमान होता है। समृद्धि अपनी लागत भी वसूलती है, जिसपर ध्यान हीं नहीं जाता। क्लोरो-फ्लोरो-कार्बन से होने वाला ओजोनक्षय शुद्ध रूप से संभ्रांत तबके द्वारा उत्पन्न संकट है, पेट्रोल कार से होने वाला ग्रीन हाऊस इफेक्ट पूरा नहीं, तो भी अधिकांश रूप में इसी तबके द्वारा सृजित रोग है। प्लास्टिक की अधिकांश थैलियाँ, अधिकांश बोतलें इन्हीं घरों से निकलती हैं और मजेदार बात है कि गंदगी पर यही तबका सबसे अधिक कुढ़ता है। ऐसी तिमिरांधता का क्या निदान है?
एलरीज क्लीवर की प्रसिद्ध उक्ति है- ‘या तो हम समाधान के हिस्से हैं या हम स्वयं ही समस्या हैं।‘ निश्चय ही समस्याएं हैं, तो समाधान भी हैं। हमें वह तंत्र विकसित करना होगा, जिसमें एम.एन.विश्वेश्वरैया जैसे लोग अभियांत्रिकी के आदर्श बन सकें- ऐसे प्रशासक प्रोत्साहित करने होंगे, जो सूर्यदेवरा रामचंद्र राव की तरह सूरत को स्वच्छ बना सकें, ऐसे कल्पनाशील प्रशासक चुनने हांेगे, जो ललित पँवार की तरह जैसलमेर की विरासत को बचा सकें या फिर ई.श्रीधरन की तरह रेल व मेट्रोरेल की आधारशिला रख सकें। हमारे नब्बे फीसदी बड़े शहर तो मात्र ट्रैफिक की समस्या तले दबे हैं और हम इस समस्या का अंदाजा इस बात से ही लगा सकते हैं कि आज हर कामकाजी व्यक्ति प्रायः अपनी कार्यावधि का आधा समय अपने कार्यस्थल पर आने-जाने में व्यतीत करता है। ट्रैफिक समस्या का समय रहते निदान न होने से हमने कलकत्ता को पिछड़ते और लगभग मरते देखा है। आज नहीं कल यही हाल बैंगलूरू का भी हो सकता है। कभी प्राचीन नगरी के रूप में विख्यात रही काशी आज एक महानगर की बजाए महाकस्बा बनकर रह गई है और कमोबेस यही हालात उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश के अधिकांश शहरों की है। कोई कच्ची सड़कों से भरा है, तो कोई कच्ची बस्तियों से। आबादी के लिहाज से विद्युत् या पेयजल समस्या का सम्यक् निदान न हो पाने का सरल उदाहरण गुडगाँव दिख सकता है, जो समृद्धि के शिखर पर होकर भी इन आधारभूत सुविधाओं से अत्यंत वंचित होता जा रहा है। शिक्षा व स्वास्थ्य पूरी तरह से सार्वजनिक क्षेत्र से उठकर महँगे निजी क्षेत्र में जा चुका है। नगर अपराध के अड्डे बनते जा रहे हैं, क्योंकि यहाँ भू-माफियाओं का स्वर्ग बन रहा है, अनुचित आव्रजन का अभयारण्य बन रहा है।
पर हर स्याह बादल में रूपहले किनारे तो होते ही हैं। यू सरकारों की यू.आई.डी.पी., आई.डी.एस.एस.एम.टी., जे.एन.यू.आर.एम. जैसी योजनाएँ अपने स्तर पर रंग भरने की कोशिश कर रही है अधिकांश घने शहरों में मेट्रो परियोजना जडें जमा रही है, अनेक सरकारें चिकित्सा और शिक्षा के लिए पहले से अधिक संवेदनशील हो रही हैं, फोर-लेन से लेकर सिक्स-लेन के हाइवेज और कंक्रीट की सड़कों के जाल बिछ रहे हैं, नई कालोनीज के लिए भू-रूपांतरण के कानूनों में परिवर्तन लाया जा रहा है, विकास की राजनीति करने वालों को जाति की राजनीति करने वालों के ऊपर तरवीज मिलने लगी है, उद्योग-व्यवसाय व रोजगार की स्थितियाँ अस्सी नब्बे के दशक से कई गुना बेहतर होकर उभरी हैं, इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट के शिक्षण संस्थानों की बाढ़ हो गई है, शहरी मजदूरांे के लिए महत्वांकाक्षी हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम का कवरेज बढ़ता जा रहा है, और ऐसी अनेक बानगियाँ हैं। आज भारत में शहरों में बसी लगभग तीस करोड़ आबादी के लिए स्वर्णिम युग भले हो न हो, पर पुराना ‘तमस्-काल‘ तो नहीं ही हैं।
देर तक और दूर तक तथ्यों की बातें हों गईं। मन फिर से इन पाषाणी स्थापत्य से टकराकर अपनी मिट्टी से जुड़ना चाह रहा है। भाषा भी अनूठी है, जो नगर से ‘नागरिक‘ शब्द बनाती है और गाँव से ‘गवाँर‘ शब्द। आज जबकि गरीबी मल्टीप्लेक्स के चलचित्रों से गायब होने लगी है, बेराजगारी की बेबसी पर संवेदनाएं मरने लगी है, ‘ये तेरा शहर भी कितना अजीब है, न कोई दोस्त है, न कोई रकीब है‘ की उदास गुनगुनाहट नए शोर-शराबे में खोने लगी है, तब मन अपने मनमोहन नागर से परिवाद करने लगा है, जो द्वारकाधीश बनकर ब्रजभूमि, वंृदावन व गोकुलग्राम को भुला बैठा है, जो बाँसुरी पर ऊँगलियाँ फिराने की बजाए ऊँगली पर चक्र घुमाने में निरत रहने लगा है, जो गोवर्धन की शंात उपत्यका छोड़ कुरूक्षेत्र की भूमि में रच-बस गया है, जो प्यारे कान्हा से ‘नटवर नागर‘ में बदल गया है। यह अवश्य है कि आज कानागर समाज अपनी महत्त्वकांक्षा में कोई महाभारत तो नहीं मचाता, लेकिन अपनी आकांक्षाओं की उन्मुक्तता में महारास को भी बुरा नहीं मानता। ग्राम समाज का योगोन्मुख मानव महानगर में तंत्रोन्मुख हो गया है और मांस-मदिरा-मोहिनी-मुद्रा को बुरा नहीं मानता। वह महाकाल के जाल में उलझ गया है और वक्त की दौड़ में बेतहाशा भागा जा रहा है। उसे एक पल का भी चैन नहीं हैं और इस तनाव में उसका स्वयं से अलगाव हो गया है।
एक कहानी स्मृत हो आई है। शहर का कुत्ता भटककर गाँव आ गया और किसी गाँव के कुत्ते से मिला। यूँ तो अपने इलाके में कोई किसी दूसरे कुत्ते को देखना पसंद नहीं करता, लेकिन शहरी कुत्ता स्वच्छ था, स्वस्थ था, संुदर था। ग्रामीण कुत्ते ने अपनी मलिन और दुर्बल काया पर संकोच करते हुए उसका स्वागत किया और उससे उसके व्यक्तित्व का राज पूछा। शहरी कुत्ते ने उसे अपने साथ चलने का आमंत्रण दिया और काह कि उसे वहाँ भोजन, शयन और भ्रमण की वह सुविधा उपलब्ध होगी, जो नब्बे फीसदी लोगों को भी उपलब्ध नहीं होती। ग्रामीण कुत्ता ऐसे स्वर्गीय सुखों की कल्पना से मंत्रमुग्ध हो गया और चलने को राजी हो गया। पर चलते-चलते अचानक उसकी दृष्टि शहरी कुत्ते के गले में पड़ी देखी। ग्रामीण कुत्ते ने उसका रहस्य पूछा तो शहरी कुत्ते ने कहा- यह एक बंधन है जो उसे उसके स्वामी से जोड़ता है। ग्रामीण कुत्ते ने कहा- ‘‘मित्र, मुझे अब नगरीय विलास की आवश्यकता नहीं रही क्योंकि मुझे भोजन और भवन की इतनी भी आवश्यकता नहीं है कि मैं उसके लिए अपने गर्दन में पट्टी डाल कर घुमूँ।
सचमुच यह आज के शहरी जीवन की विडम्बना है, जो हमारे गले में फन्दे की तरह लगी होती है और हम सोचते हैं कि हम सुखी हैं। कहते हैं, जरूरतें फकीरों की भी पूरी हो जाती हैं और हसरतें बादशाहों की भी अधूरी रह जाती हैं। ऐसे में नगरीय जीवन प्रायः मृगमरीचिका सिद्ध होता है।

जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे ने कहा है कि मनुष्य इस धरती का चर्म रोग है। सचमुच अगर हम आकाश से देखें तो मानव बस्तियाँ एक धब्बे की तरह दिखाई देंगी और इसका कारण यह है कि इस बसावट में बेतरतीबी है, बदसूरती है। खलील जिब्रान ने ‘द प्रोफेट‘ में घर के विषय में कहा है कि अगर मेरा वश चले, तो मैं अपनी मुट्ठी में तुम्हारे घरों को समेट लूं और उन्हें खेतों, पहाड़ों और जंगलों में बीज की तरह बिखेर दूं, तब शायद तुम्हारे घर सचमुच घर की तरह दिखेंगे, क्योंकि वे प्रकृति के परिवेश में हांेगे, उनमें प्रकृति से सुरक्षा भी होगी और प्रकृति से निकटता भी। उनमें प्रकृति का सौंदर्य भी होगा और प्रकृति स्वास्थ्यगत अनुकूलता भी होगी। देखते हैं, आज बेसमेंट में बस्तीे बसाने वाली, स्काई-स्क्रैपर में गगनचुंबी उंचाइयां छूने वाली, सागर में शहर बनानेवाली ये दुनिया कब ये स्वर सुनती है, तबतक के लिए मैं ”नगर-नगर और डगर-डगर, मैं तो बस चला-चला” गाता हुआ विदा लेता हूं।